लोक सेवाओं में सुधार
लोक सेवा , सरकार के कामकाज के संचालन के लिए आवश्यक है । औपनिवेशिक काल से ही लोक सेवा को भारत में प्रशासन का ' लौह ढांचा ( स्टील फ्रेम ) ' माना जाता है । लोक सेवा की यह औपनिवेशक विरासत वैश्वीकरण के इस तेजी से बदलते युग में भी चली आ रही है । इसी संदर्भ में लोक सेवा में सुधार सुशासन का अतिआवश्यक अंग हो गया है । सेवाओं को कारगर ठंग से जन - जन तक पहुंचाने हेतु लोक सेवा में नई सोच और पुनः अभिविन्यास की आवश्यकता है ।
लोक सेवा का तात्पर्य ऐसे करियर लोक सेवकों से हैं जो भारत गणराज्य की स्थायी अधिशासी शाखा हैं । लोक सेवा देश की प्रशासनिक मशीनरी की रीढ़ है । भारत के संसदीय लोकतंत्र में , प्रशासन को चलाने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से जनप्रतिनिधियों ( जनता द्वारा निर्वाचित ) यानी कैबिनेट मंत्रियों और संसद के सदस्यों की है । मंत्रीगण नीतियां निर्धारित करते हैं और उन्हें कार्यान्वित करने का काम भारत के राष्ट्रपति के अधीन कार्यरत लोक सेवकों का है । हालांकि संविधान के अनुच्छेद 311 में लोक सेवकों को राजनीति से प्रेरित प्रतिशोधी कार्रवाई से सुरक्षा प्रदान की गई है ।
भारत में लोक सेवा का विकास
प्राचीन भारत
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में प्रशासनिक ढांचे के सप्तांग का वर्णन है- स्वामी ( शासक ) , अमात्य ( नौकरशाह ) , जनपद ( क्षेत्र ) , दुर्ग ( किला बंद राजधानी ) , कोष ( खजाना ) , दंड ( सेना ) और मित्र ( सहयोगी ) । अर्थशास्त्र के अनुसार नौकरशाही के ऊंचे स्तर में मंत्री और अमात्य शामिल होते थे । मंत्री , राजा के सबसे ऊंचे दर्जे के सलाहकार और अमात्य लोक सेवक हुआ करते थे । मध्यकालीन भारत : मुगल काल के दौरान नौकरशाही मनसबदारी व्यवस्था पर आधारित थी । मनसबदारी प्रणाली मूल रूप से लोक सेवकों का समूह थी जिन्हें असैन्य या सैन्य सेवा में तैनात किया जाता था । ब्रिटिश भारत : ब्रिटिश भारत में मैकॉले की 1835 की रिपोर्ट के कार्यान्वयन से लोक सेवा में बड़े बदलाव आए । मैकॉले की रिपोर्ट में सिफारिश की गई थी कि सिर्फ सर्वश्रेष्ठ और मेधावी लोग ही ब्रिटिश साम्राज्य के हितों की पूर्ति के लिए भारतीय लोक सेवा में शामिल होंगे । स्वतंत्रता पश्चातः स्वतंत्रता के बाद भारतीय लोक सेवा प्रणाली में ब्रिटिश ढांचे के कुछ तत्वों जैसे शैक्षिक उपलब्धियों पर आधारित खुली प्रवेश प्रणाली और स्थाई कार्यकाल को एकीकृत प्रशासनिक
व्यवस्था के तौर पर जारी रखा गया । 1947 में ब्रिटिश शासन से मुक्ति के पश्चात् भारत के विभाजन के साथ ही भारतीय लोक सेवा का भी भारत और पाकिस्तान के नए शासन के बीच बंटवारा हो गया । आईसीएस को भारत में भारतीय प्रशासनिक सेवा और पाकिस्तान में पाकिस्तान प्रशासनिक सेवा कह गया । आधुनिक भारतीय प्रशासनिक सेवा का गठन भारत के संविधान के भाग 14 में अनुच्छेद 312 ( दो ) और अखिल भारतीय सेव अधिनियम 1951 के तहत किया गया ।
लोक सेवाओं का वर्गीकरण
भारत के संविधान के भाग 14 में भारत हेतु सेवाओं की विभिन्न श्रेणियां निर्धारित की गई हैं । इस अध्याय का नाम केंद्र और राज्य के अंतर्गत सेवाएं रखा गया है । संविधान में सेवाओं के प्रकार और श्रेणियों का विस्तारपूर्वक वर्णन नहीं किया गया है । संविधान के अनुसार हम सेवाओं को निम्नलिखित श्रेणियों में वर्गीकृत करते हैं अखिल भारतीय सेवाएं ( एआईएस ) , राज्य सेवाएं एवं स्थानीय तथ नगर निगम सेवाएं । केंद्रीय सेवा के चार समूह हैं - केंद्रीय सेवा समूह क , ख , ग और घ ।
चुरई कनारन भारत में पहले उप कलेक्टर चुरई कनारन ( 1812 ) , थिय्यार कुलीन पुरुष , भारत में पहले थे , यद्यपि 1893 के बाद उसके उप कलेक्टर , उस समय किसी भारतीय के लिए सबसे ऊंचा पद । अधिकारियों के चयन के लिए लोक सेवा का बीज 1854 के नोर्थकोट - त्रिवेलयान सुधार वार्षिक परीक्षा शुरू की गई । अपनाए जाने से पड़ा । ईस्ट इंडिया कंपनी के काल में लोक सेवाओं 1858 में एचईआईसीसीएस के को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया- प्रसंविदाबद्ध , अप्रसंविदाबद्ध स्थान पर भारतीय लोक सेवा और विशेष लोक सेवाएं । प्रसंविदाबद्ध लोक सेवा को सम्मानीय ईस्ट ( आईसीएस ) शुरू की गई जो इंडिया कंपनी की लोक सेवा ( एचईआईसीसीएस ) के नाम से 1858 और 1947 के बीच भारत में सर्वोच्च लोक सेवा रही । जाना जाता था और इसमें मुख्य रूप से सरकार के शीर्ष पदों पर आईसीएस में अंतिम नियुक्ति 1942 में की गई थी । विराजमान लोक सेवक शामिल होते थे । ब्रिटेन की संसद द्वारा भारत सरकार अधिनियम 1919 पारित अनकॉविनेटेड ( अंप्रसंविदाबद्ध ) लोक सेवा की शुरुआत केवल किए जाने के साथ ही भारत के लिए नियुक्त मंत्री की देखरेख में प्रशासन के निचले स्तर पर भारतीयों को प्रवेश देने के लिए की भारतीय लोक सेवा को दो भागों में बांटा गया , अखिल भारतीय सेवा गई थी । विशेष सेवा में भारतीय वन सेवा , इंपीरियल पुलिस और एवं केंद्रीय सेवा । 1946 में आयोजित सम्मेलन में केंद्रीय मंत्रिमंडल भारतीय राजनीतिक सेवा जैसे विशिष्ट विभाग थे जिनके सदस्य ने भारतीय लोक सेवा के आधार पर भारतीय प्रशासनिक सेवा एवं प्रसंविदाबद्ध लोक सेवा या भारतीय सेना से लिए जाते थे । इंपीरियल इंपीरियल पुलिस के आधार पर भारतीय पुलिस सेवा गठित करने पुलिस के सदस्यों में भारतीय सेना के कई अधिकारी शामिल का फैसला लिया ।
केंद्रीय सेवा के समूह क में 34 प्रकार हैं । इनमें से कुछ हैं भारतीय विदेश सेवा , भारतीय लेखा परीक्षा एवं लेखा सेवा , भारतीय सांख्यिकी सेवा , भारतीय आर्थिक सेवा , भारतीय सूचना सेवा , भारतीय रेलवे सेवा इत्यादि । समूह ख की सेवाओं में निम्नलिखित श्रेणियां शामिल हैं- केंद्रीय सचिवालय सेवा , भारतीय भौगोलिक सर्वेक्षण , भारतीय प्राणि सर्वेक्षण , केंद्रीय सचिवालय आशुलिपिक सेवा । भारत में संपूर्ण लोक सेवा तंत्र में कार्मिक संवर्गों में सबसे अधिक संख्या केंद्रीय सचिवालय सेवा और भारतीय राजस्व सेवा ( आईटी एवं सी तथा सीई ) में है । लोक सेवक भारत सरकार या राज्य सरकारों के कर्मचारी होते हैं लेकिन सरकार का हर कर्मचारी लोक सेवक नहीं होता । 2010 तक भारत में 64 लाख सरकारी कर्मचारी थे लेकिन उनमें से 50,000 से भी कम लोक सेवक थे । भारत सरकार ने 2015 में भारतीय कौशल विकास सेवा , और 2016 में भारतीय उद्यम विकास सेवा के गठन को स्वीकृति दी थी । इसके अतिरिक्त 2019 में केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने रेलवे तंत्र में संरचनात्मक सुधार के तहत भारतीय रेलवे के अंतर्गत आने वाली सभी लोक सेवाओं के विलय से एकीकृत भारतीय रेल प्रबंधन सेवा के गठन की स्वीकृति दी थी । सरकार ने अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए सोच समझ कर लोक सेवा में सुधार किया ताकि नीतियों को प्रभावी और कुशलतापूर्वक कार्यान्वित किया जा सके । हाल के समय में
का फसला लिया । प्रौद्योगिकी उन्नयन , अधिक विकेंद्रीकरण तथा सामाजिक सक्रियता के कारण वैश्विक स्तर पर बदलाव तेज हुआ है । सरकार समझ रही है कि इन बदलावों के असर से सेवाओं की प्रभावी डिलीवरी , पारदर्शिता , जवाबदेही और कानून के शासन के जरिए बेहतर प्रशासन की अपेक्षा बढ़ रही है । लोक सेवा , सरकार का प्रमुख अंग है इसलिए उसे लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए बदलते समय के अनुसार कदम से कदम मिलाना होगा । ' सुधार ' का उद्देश्य लोक सेवा का पुनर्विन्यास कर उसे जन सेवाएं प्रदान करने हेतु ओजस्वी , कारगर और जवाबदेह तंत्र बनाना है जो सदाचार एवं सत्यनिष्ठा , निष्पक्षता और तटस्थता के मूल्यों से संचालित हो । सुधार से तात्पर्य है नागरिकों तक पहुंचने वाली जन सेवाओं की गुणवत्ता बढ़ाना तथा सरकार के मूल क्रियाकलाप की क्षमता में संवर्धन करना जिसके फलस्वरूप सतत विकास की दिशा में आगे बढ़ा जा सके ।
भारतीय लोक सेवाओं की कमियां
◆ क्षमता निर्माण में कमजोरी
◆अकुशल प्रोत्साहन प्रणालियां जिसमें ईमानदार और उत्कृष्ट लोक सेवकों को सराहने की बजाय भ्रष्ट और अक्षम लोगों को सम्मानित किया जाता है ।
◆ समयातीत नियम और कार्य प्रक्रियाएं जो लोक सेवक के प्रभावी ढंग से काम करने में बाधा उत्पन्न करती हैं ।
" प्रशासनिक प्रणाली का कोई विकल्प नहीं है । संघ चला जाएगा , अगर आपके पास ऐसी अच्छी अखिल भारतीय सेवा नहीं है जिसे अपनी राय देने की आज़ादी हो , जिसे यह विश्वास हो कि आप उसके काम में उसका साथ देंगे तो अखंड भारत नहीं बना सकते । अगर आप इस प्रणाली को नहीं अपना सकते तो मौजूदा संविधान का पालन न करें । इसकी जगह कुछ और व्यवस्था करें ..... यह लोग औजार हैं । इन्हें हटाने पर और मुझे देशभर में उथल - पुथल की स्थिति के सिवा और कुछ नजर नहीं आता ।. --" भारत की संविधान सभा में अखिल भारतीय सेवाओं के बारे में चर्चा के दौरान सरदार वल्लभभाई पटेल -
◆ पदुन्ति और मनोनयन में सर्वांगी असंगतियां । ◆पर्याप्त पारदर्शी और जवाबदेही प्रक्रियाओं का अभाव विहसलब्लोअर यानि चेतावनी देने वालों के लिए कोई सुरक्षा भी नहीं है ।
◆ मनमाने और सनक से किए गए तबादले- कार्यकाल की असुरक्षा से संस्थानीकरण में बाधा आती है । ◆राजनीतिक हस्तक्षेप और प्रशासनिक मिलीभगत ◆पदोन्नतियों , कार्य आवंटन और कामों में कुछ विशिष्ट सेवाओं का वर्चस्व ।
संरचनात्मक मुद्दे
सामान्य अधिकारी बनाम विशेषज्ञ अधिकारी : लोक सेवाओं की स्थापना मुख्यतः सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों के कार्यान्वयन , कानून - व्यवस्था बनाए रखने तथा सरकारी आदेशों को लागू करने जैसे शासन के मुख्य कामकाज करने हेतु की गई है । हालांकि , वैश्वीकरण और आर्थिक सुधारों के आरंभ होने से बदलती जरूरतों के कारण शासन की भूमिका में परिवर्तन आया है । अतः प्रौद्योगिकी के क्रमिक विकास ( उदाहरणस्वरूप साइबर सुरक्षा ) और जटिल कारोबारी , व्यापारिक एवं कानूनी पहलुओं के कारण नई चुनौतियां उत्पन्न हुई हैं जिसका सरकार को मार्ग निर्देशन करना होगा । इसलिए नीतिगत स्तर पर क्षेत्र विशिष्ट ज्ञान के लिए ( विशेषज्ञ अधिकारियों की ) अधिक मांग है । भारतीय राजस्व सेवा , भारतीय आर्थिक सेवा , भारतीय सांख्यिकी सेवा जैसी मौजूदा विशेषज्ञ सेवाओं के भीतर यह भावना बढ़ रही है कि इन्हें जिस काम के लिए प्रशिक्षित किया गया है उसके लिए न तो पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलता है और न ही अवसर । भारत सरकार में अधिकांश प्रतिष्ठित पदों पर विशिष्ट सेवाएं हावी हो जाती हैं : जिससे प्रतिभा का असमान उपयोग होता है तथा अन्य सेवाओं के मनोबल पर भी प्रतिकूल 7 प्रभाव पड़ता है ।
नए सुधारः मिशन कर्मयोगी
सरकार ने लोगों तक बेहतर सेवाएं पहुंचाने के उद्देश्य से एक नए व्यापक लोक सेवक सुधार कार्यक्रम की घोषणा की है । अपने पहले कार्यकाल से ही प्रधानमंत्री लोक
सेवाओं में सुधार पर जोर दे रहे हैं । सरकार की नीतिगत परामर्श संस्था नीति आयोग के पास 2018 की ऐतिहासिक रिपोर्ट में इस मुद्दे को समर्पित अध्याय है । नए भारत @ 75 हेतु रणनीति रिपोर्ट में “ जन सेवाओं को और अधिक प्रभावी एवं कुशलतापूर्वक पहुंचाने के लिए लोक सेवकों की भर्ती , प्रशिक्षण और कार्य - निष्पादन के मूल्यांकन में सुधार करने का तंत्र स्थापित करने पर जोर दिया गया है ताकि नव भारत 2022 ( न्यू इंडिया ) के लिए परिकल्पित विकास लक्ष्यों को हासिल किया जा सके । " सरकार ने 2 सितंबर 2020 को यह घोषणा की थी कि मिशन कर्मयोगी कार्यक्रम के अंतर्गत लोक सेवकों को अधिक सृजनात्मक , रचनात्मक कल्पनाशील , नवप्रवर्तनशील , सक्रिय पेशेवर , प्रगतिशील , ओजस्वी , सामर्थ्यवान पारदर्शी और प्रौद्योगिकी - समर्थ बनाने हेतु प्रशिक्षित किया जाएगा । प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने लोक सेवा क्षमता निर्माण के लिए नई राष्ट्रीय व्यवस्था अर्थात् “ मिशन कर्मयोगी " को स्वीकृति दी थी जिसका उद्देश्य भारत सरकार में व्यक्तिगत , संस्थागत और प्रक्रियाओं के स्तर पर क्षमता निर्माण के ढांचे का कायाकल्प करना है । केंद्र सरकार के 46 लाख कर्मचारियों को लक्षित करने वाली यह पहल “ शासन , कार्य - निष्पादन और जवाबदेही " के तीन स्तभों पर टिकी होगी । इसमें कहा गया है कि नियमों की जगह भूमिकाओं को , संपर्कहीनता की जगह तालमेल , बहु - विभागीय संपर्क को महत्व दिया जाएगा तथा क्षमता निर्माण के अनवरत कार्यक्रम होंगे । सुधार का मूलभूत उद्देश्य ' जन केंद्रित लोक सेवा ' का निर्माण करना है जो आर्थिक वृद्धि और जनकल्याण के लिए हितकारी सेवाओं का विकास और डिलीवरी करने में सामर्थ्यवान हो । तदनुसार मिशन कर्मयोगी में “ नियम आधारित प्रशिक्षण की जगह भूमिका आधारित प्रशिक्षण " को महत्त्व दिया गया है । अधिक जोर व्यवहारात्मक परिवर्तन पर दिया गया है । राष्ट्रीय लोक सेवा क्षमता निर्माण कार्यक्रम को इस तरह से बनाया गया है कि यह भारतीय संस्कृति और संवेदनाओं की परिधि
सरकार ने अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए सोच समझ कर लोक सेवा में सुधार किया ताकि नीतियों को प्रभावी और कुशलतापूर्वक कार्यान्वित किया जा सके । हाल के समय में प्रौद्योगिकी उन्नयन , अधिक विकेंद्रीकरण तथा सामाजिक सक्रियता के कारण वैश्विक स्तर पर बदलाव तेज हुआ है ।
में रहने के साथ - साथ दुनिया भर की सर्वश्रेष्ठ कार्य पद्धतियों एवं संस्थानों से अध्ययन संसाधन प्राप्त कर सकें । इस कार्यक्रम के लिए एकीकृत सरकारी ऑनलाइन प्रशिक्षण आईजीओटी कर्मयोगी प्लेटफार्म की स्थापना की जाएगी । प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में सार्वजनिक मानव संसाधन परिषद तथा केंद्रीय मंत्री , मुख्यमंत्री , प्रतिष्ठित मानव संसाधन पेशेवर ( एचआर प्रैक्टिशनर ) , राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ इस संपूर्ण क्षमता निर्माण कार्यक्रम की निगरानी करेंगे । प्रशिक्षण मानकों के साथ सामंजस्य स्थापित करने , साझा फैकल्टी और संसाधन तैयार करने तथा सभी केंद्रीय प्रशिक्षण संस्थानों पर नजर रखने के लिए क्षमता निर्माण आयोग नाम से विशेषज्ञ संस्था बनाई जाएगी । धारा 8 के अंतर्गत लाभ के लिए नहीं कंपनी के रूप में विशेष प्रयोजन व्यवस्था ( स्पेशल पर्पस व्हीकल ) , एसपीवी की स्थापना की जाएगी जिसके पास आईजीओटी कर्मयोगी प्लेटफार्म का स्वामित्व होगा तथा उसका प्रबंधन करेगी । एसपीवी के पास भारत सरकार की ओर से सभी बौद्धिक संपत्ति अधिकारों का स्वामित्व होगा । आईजीओटी कर्मयोगी प्लेटफार्म के सभी उपयोगकर्ताओं के कार्य - निष्पादन के मूल्यांकन हेतु एक उपयुक्त निगरानी और आकलन ढांचा भी तैयार किया जाएगा ताकि प्रमुख प्रदर्शन संकेतकों को डैशबोर्ड पर दिखाया जा सके । कोविड महामारी के दौरान स्वास्थ्य कर्मियों को प्रशिक्षित करने के लिए आईजीओटी मॉडल का सफलतापूर्वक परीक्षण किया गया । 12 लाख 73 हजार से अधिक स्वास्थ्य कर्मियों ने 3 महीने के भीतर विभिन्न अवधियों के 17 लाख 66 हजार कोर्स पूरे किए । आईजीओटी कर्मयोगी अध्ययन सामग्री के लिए जीवंत एवं विश्वस्तरीय मंच के रूप में उभर सकता है जहां सोच - समझ कर तैयार जांची - परखी डिजिटल ई - अध्ययन सामग्री उपलब्ध होगी । क्षमता निर्माण के अलावा परिवीक्षा अवधि , तैनाती , कार्य तथा रिक्तियों की अधिसूचना जैसी सेवाएं प्रस्तावित दक्षता ढांचे में अंततः एकीकृत हो जाएंगी । लगभग 46 लाख केंद्रीय कर्मचारियों को प्लेटफार्म पर जोड़ने के लिए 2020-21 से 2024-25 की 5 साल की अवधि में 510 करोड़ 86 लाख रुपये खर्च किए जाएंगे । मिशन कर्मयोगी का उद्देश्य भारतीय लोक सेवक को अधिक सृजनात्मक , रचनात्मक और नागरिक हितकारी बनाकर भविष्य के लिए तैयार करना है । सरकार ने कहा है कि नोडल भर्ती एजेंसी के जरिए उसके द्वारा पिछले महीने लाए गए सुधार के बाद यह संपूर्ण संवर्ग और पदों - कॉन्स्टेबल से लेकर पुलिस महानिदेशक , सहायक सेक्शन अधिकारी से लेकर सचिवालय स्तर तक के लिए भर्ती के बाद का सुधार कार्यक्रम होगा । करियर के मध्य में प्रशिक्षण अब केवल शीर्ष स्तर के अधिकारियों की बजाय सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए उपलब्ध होगा तथा उनके विवरण एवं मूल्यांकन अनवरत जारी रहेंगे । अगर विशेष नियुक्ति की
जरूरत पड़ती है तो नज़रिए और परिप्रेक्ष्य पर निर्भर रहने की बजाय प्रौद्योगिकी की मदद से अधिकारियों के विवरण को देखकर कर भर्ती की जा सकती है ।
मुख्य विशेषताएं
ऐसी आशा है कि यह सुधार लोक सेवकों की क्षमता निर्माण की नींव रखेंगे ताकि वह भारतीय संस्कृति और संवेदनाओं की परिधि में रहें तथा अपनी जड़ों से हमेशा जुड़े रहने के साथ - साथ दुनिया भर के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों और पद्धतियों से भी सीख लें । यह कार्यक्रम एकीकृत सरकारी ऑनलाइन प्रशिक्षण आईजीओटी कर्मयोगी प्लेटफार्म की स्थापना के साथ शुरू होगा । कार्यक्रम के मुख्य निर्देशन सिद्धांत हैं
1. ' नियम आधारित ' से ' भूमिका आधारित ' एचआर प्रबंधन की तरफ बढ़ने में सहयोग देना । पद की आवश्यतकताओं के अनुरूप लोक सेवकों की दक्षता को देखते हुए काम आवंटित करना ।
2. ' कार्यस्थल पर सीखने ( ऑनसाइट लर्निंग ) ' के पूरक के रूप में ' कार्यस्थल के बाहर सीखने ( ऑफसाइट लर्निंग ) ' पर जोर देना ।
3. अध्ययन सामग्री , संस्थानों और कर्मियों सहित साझा प्रशिक्षण बुनियादी ढांचे का तंत्र तैयार करना ।
4. सिविल सेवा से संबंधित सभी पदों को भूमिकाओं , गतिविधियों तथा दक्षता के ढांचे ( एफआरएसी ) संबंधी दृष्टिकोण के साथ व्यवस्थित करना तथा प्रत्येक सरकारी संस्थान में चिह्नित एफआरएसी हेतु उपयुक्त अध्ययन सामग्री का सृजन करना और सुलभ कराना
5. सभी लोक सेवकों को सीखने की आत्म - प्रेरित तथा अधिदेशित प्रक्रिया में अपने व्यवहार , क्रियाकलाप और कार्यक्षेत्र से संबंधित दक्षताओं को निरंतर विकसित एवं सुदृढ़ करने का अवसर उपलब्ध कराना ।
6. सभी केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों एवं उनके संगठनों को समर्थ बनाना कि वे वार्षिक वित्तीय सब्सक्रिप्शन के जरिए प्रत्येक कर्मचारी के लिए अध्ययन सामग्री के सह - सृजन तथा सहयोगी एवं समान तंत्र को साझा करने हेतु अपने संसाधनों का सीधे निवेश करें । 7. सार्वजनिक प्रशिक्षण संस्थानों विश्वविद्यालयों स्टार्टअप तथा व्यक्तिगत विशेषज्ञों सहित सर्वश्रेष्ठ अध्ययन सामग्री का सृजन
करने वालों को प्रोत्साहित करना तथा उनके साथ भागीदारी करना । 8. क्षमता निर्माण , अध्ययन सामग्री का सृजन , उपयोगकर्ता की प्रतिक्रिया के विभिन्न पहलुओं के बारे में आईजीओटी कर्मयोगी द्वारा उपलब्ध कराए गए डाटा का विश्लेषण करना तथा दक्षता निर्धारण और नीतिगत सुधार हेतु क्षेत्रों का चयन करना । सहयोगी और सहभागी क्षमता निर्माण तंत्र का प्रबंधन और नियमन करने में एकसमान दृष्टिकोण सुनिश्चित करने हेतु क्षमता निर्माण आयोग गठित करने का भी प्रस्ताव किया गया है । .
आयोग की भूमिका इस प्रकार होगी
वार्षिक क्षमता निर्माण योजनाओं को स्वीकृति दिलाने में प्रधानमंत्री सार्वजनिक संसाधन मानव संसाधन परिषद को सहयोग करना ।
◆ लोक सेवाओं के क्षमता निर्माण से जुड़े सभी केंद्रीय प्रशिक्षण संस्थानों के कामकाज का निरीक्षण करना । ◆आंतरिक और बाहरी फैकल्टी तथा संसाधन केंद्रों सहित साझा अध्ययन संसाधन का सृजन करना ।
◆संबद्ध विभागों के साथ क्षमता निर्माण योजनाओं के कार्यान्वयन का समन्वय और निरीक्षण करना ।
◆ प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण , शिक्षणशास्त्र तथा कार्यप्रणाली के मानकीकरण पर सिफारिशें देना ।
◆ सभी लोक सेवाओं के करियर के मध्य में सामान्य प्रशिक्षण कार्यक्रम हेतु नियम स्थापित करना ।
◆सरकार को एचआर प्रबंधन तथा क्षमता निर्माण के क्षेत्रों में आवश्यक नीतिगत उपायों का सुझाव देना । कनिक मोरनि किसान
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' सुधार ' का उद्देश्य लोक सेवा का पुनर्विन्यास कर उसे जन सेवाएं प्रदान करने हेतु ओजस्वी , कारगर और जवाबदेह तंत्र बनाना है जो सदाचार एवं सत्यनिष्ठा , निष्पक्षता और तटस्थता के मूल्यों से संचालित हो । सुधार से तात्पर्य है नागरिकों तक पहुंचने वाली जन सेवाओं की गुणवत्ता बढ़ाना तथा सरकार के मूल क्रियाकलाप की क्षमता में संवर्धन करना जिसके फलस्वरूप सतत विकास की दिशा में आगे बढ़ा जा सके ।
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वित्तीय आवश्यकता
लगभग 46 लाख केंद्रीय कर्मचारियों को कार्यक्रम से जोड़ने में 2020-21 से 2024-25 तक की पांच साल अवधि में 510 करोड़ 86 लाख रुपये खर्च किए जाएंगे । यह खर्च 5 करोड़ अमेरिकी डॉलर के बराबर आंशिक रूप से बहुस्तरीय सहायता द्वारा वित्त पोषित होगा । कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 8 के तहत एनपीसीएससीबी हेतु विशेष प्रयोजन व्यवस्था ( स्पेशल पर्पस व्हीकल एसपीवी ) स्थापित की जाएगी । एसपीवी गैर - लाभकारी . कंपनी होगी तथा उसके पास आईजीओटी कर्मयोगी प्लेटफार्म का स्वामित्व होगा और उसका प्रबंधन करेगी । एसपीवी सामग्री का सृजन और संचालन करेगी , उन्हें एक जगह सम्मिलित करने से जुड़ी गतिविधियां तैयार करेगी तथा सामग्री की पुष्टि , स्वतंत्र मूल्यांकन के निरीक्षण एवं दूरमापी डाटा उपलब्धता से जुड़े आईजीओटी कर्मयोगी प्लेटफार्म की मुख्य कारोबारी सेवाओं का प्रबंधन करेगी । एसपीवी के पास भारत सरकार की ओर से सभी बौद्धिक संपत्ति अधिकार का स्वामित्व होगा । आईजीओटी कर्मयोगी प्लेटफार्म के सभी उपयोगकर्ताओं के कार्य - निष्पादन के मूल्यांकन हेतु उपयुक्त निगरानी और मूल्यांकन ढांचा स्थापित किया जाएगा ताकि प्रदर्शन के मुख्य संकेतकों को डैशबोर्ड पर दिखाया जा सके । केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस वर्ष आयुध निर्माणी बोर्ड ( ओएफबी ) के निगमीकरण को भी स्वीकृति दी है जो रक्षा मंत्रालय के रक्षा उत्पादन विभाग ( डीडीपी ) की उत्पादन शाखा है तथा 41 आयुध निर्माणियों का समन्वय करता है । हालांकि ओएफबी कर्मचारियों की सेवा शर्तों में कोई बदलाव नहीं होगा तथा सरकार उनके हितों की सुरक्षा के प्रति संकल्पबद्ध है । विभिन्न उत्पादन इकाइयों के सभी ओएफबी कर्मचारियों ( समूह क , ख , और ग ) का तबादला सरकारी कर्मचारियों के रूप में उनकी सेवा शर्तों को बदले बिना मानित ( डीम्ड ) प्रतिनियुक्ति पर शुरुआत में 2 वर्ष की अवधि हेतु निगम इकाइयों में किया जाएगा ।
निष्कर्ष
लोक सेवकों के क्षमता संवर्धन की विविध प्रकार की सेवाएं प्रदान करने , कल्याणकारी कार्यक्रमों के कार्यान्वयन तथा शासन के मूल क्रियाकलापों के निष्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका रहती है । नागरिकों तक सेवाएं कुशलतापूर्वक पहुंचाने के उद्देश्य से लोक सेवा क्षमता के निर्माण के लिए कार्य
संस्कृति का कायाकल्प , सार्वजनिक संस्थानों का सुदृढीकरण तथा आधुनिक प्रौद्योगिकी को अपनाकर लोक सेवा क्षमता में क्रांतिकारी कायाकल्प का प्रस्ताव है । देश का भविष्य नौकरशाही में सुधार के बिना प्रगतिशील नहीं हो सकता । सेवा का युक्तिकरण और समन्वय समय की मांग है । सेवाओं के युक्तिकरण और समन्वय के जरिए केंद्र और राज्य स्तर पर मौजूदा 60 से अधिक अलग - अलग लोक सेवाओं को कम करने की जरूरत है । अभ्यर्थियों को प्रतिभा की केंद्रीय व्यवस्था के अंतर्गत लाया जाना चाहिए जिसके बाद उम्मीदवार की क्षमताओं तथा पद के कार्य विवरण को देखते हुए उम्मीदवारों को कार्यभार दिए जाएंगे । मौजूदा लोक सेवकों को भी उनकी शैक्षिक विशेषज्ञता तथा कार्यस्थल पर प्राप्त व्यावहारिक अनुभव के आधार पर कार्य सौंपे जाने चाहिए । एक बार परीक्षा लेने , पद आवंटन तथा तदनुसार जीवन भर सुविधाओं देने पर अत्यधिक जोर दिए जाने की व्यवस्था को खत्म किया जाना चाहिए । लोक सेवक , प्रधान जन सेवक होते हैं , उनके लिए उत्कृष्टता की कसौटी संभ्रांतता नहीं बल्कि यह होनी चाहिए कि वे जिनका प्रतिनिधित्व करते हैं उनके साथ कितने जुड़े हुए हैं । लोक सेवा सुधारों को सेवाओं की पुरानी संरचना और संस्कृति का पुनर्विन्यास करना चाहिए तथा औपनिवेशिक परंपरा का त्याग करना चाहिए ताकि नागरिकों के लिए सेवाओं की गुणवत्ता और संवेदनशीलता को बढ़ाया जा सके जो कि सतत आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए जरूरी है ।
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