हरितक्रांति से सदाबहार क्रांति की ओर होत्सव
(डा.जगदापलपलमा वर्तमान में भारत दूध , दालों , मसाले , चाय , काजू और जूट का विश्व में सबसे बड़ा उत्पादक है , जबकि गेहूं , चावल , फल व सब्जियां , गन्ना , कपास और तिलहन के उत्पादन में इसका दूसरा स्थान है । विश्व के लगभग 4 प्रतिशत जलस्रोत और 2.4 प्रतिशत भूमि संसाधन होने के बावजूद भारत द्वारा विश्व की लगभग 18 प्रतिशत जनसंख्या को खाद्य सुरक्षा उपलब्ध कराई गई है , जो अपनी तरह का अकेला वैश्विक कीर्तिमान है ।)
हमारे देश आजादी का अमृत महोत्सव ( 75 वर्ष ) मना रहा है । भारत ने स्वतंत्रता के इस काल में विकास और कल्याण के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक गौरवशाली उपलब्धियां हासिल की हैं । कृषि अनुसंधान और विकास ऐसा ही एक प्रमुख क्षेत्र है , जिसके माध्यम से देश बहुत पहले खाद्य सुरक्षा हासिल कर चुका है और पोषण सुरक्षा जैसे महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य की ओर तेज़ी से कदम बढ़ा रहा है । आज भारतीय कृषि की एक उज्ज्वल , सुंदर और प्रगतिशील तस्वीर दिखाई दे रही है , जिसमें कृषकों की समृद्धि के रंग भी शामिल हैं । देश ने भूख , अकाल और शर्मनाक अन्न - दासता के कठिन दौर से आगे निकलकर खाद्यान्न आत्मनिर्भरता हासिल की है , और स्वयं को कृषि निर्यात के लिए भी सक्षम बनाया है । भारत द्वारा जरूरतमंद और संकटग्रस्त देशों को अन्न सहायता भी प्रदान की जाती है । कृषि तथा संबंधित उद्यमों के क्षेत्र में भारत ने वैश्विक पटल पर भी अपना एक विशेष स्थान अर्जित किया है । वर्तमान में भारत दूध , दालों , मसाले , चाय , काजू और जूट का विश्व में सबसे बड़ा उत्पादक है , जबकि गेहूं , चावल , फल व सब्जियां , गन्ना , कपास और तिलहन के उत्पादन में इसका दूसरा स्थान है । विश्व के लगभग 4 प्रतिशत जलस्रोत और 2.4 प्रतिशत भूमि संसाधन होने के बावजूद भारत द्वारा विश्व की लगभग 18 प्रतिशत जनसंख्या को खाद्य सुरक्षा उपलब्ध कराई गई है , जो अपनी तरह का अकेला वैश्विक कीर्तिमान है । तीसरे अग्रिम अनुमान के अनुसार वर्ष 2020-21 में देश का कुल खाद्यान्न उत्पादन 305.44 मिलियन टन अनुमानित है , जो अब तक का उच्चतम रिकॉर्ड है । इसी प्रकार बागवानी क्षेत्र में भी इस दौरान 326.58 मिलियन टन के कीर्तिमान उत्पादन का अनुमान है । पिछले लगभग 70 वर्षों के दौरान कृषि उत्पादन में निरंतर वृद्धि होती रही । वर्ष 1950KKहJ-51 से 2017-18 के बीच खाद्यान्न उत्पादन में 5.6 गुना , बागवानी फसल उत्पादन में 10.5 गुना , मछली में 16.8 गुना , दूध में 10.4 गुना और अंडा उत्पादन में 52.9 गुना वृद्धि दर्ज की गई । निरंतर घटते जोत आकार , सिमटते प्राकृतिक संसाधन और बिगड़ती जलवायु जैसी गंभीर चुनौतियों के बीच भारतीय कृषि की इन उपलब्धियों का श्रेय काफी हद तक कृषि विज्ञान , अनुसंधान और नवोन्मेष के माध्यम से विकसित उन्नत कृषि
विधियों और प्रौद्योगिकी को जाता है । आजादी के तुरंत बाद कृषि अनुसंधान को विशेष प्राथमिकता देकर भारत सरकार ने एक बड़ी पहल की , जिसका लाभ आज पूरे देश को मिल रहा है । पिछले 75 वर्षों में भारत सरकार के संगठित प्रयासों से देश में एक विस्तृत , व्यापक और कुशल कृषि अनुसंधान नेटवर्क का विकास हुआ है , जिसकी गणना विश्व के विशालतम नेटवर्क्स में की जाती है । इस संदर्भ में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ( आईसीएआर ) देश की शीर्षस्थ और अग्रणी संस्था है , जिसके नेतृत्व में कृषि अनुसंधाम के समन्वय , प्रोत्साहन और विकास का कार्य किया जा रहा है । वर्तमान में आईसीएआर के कृषि अनुसंधान , शिक्षा एवं प्रसार के नेटवर्क के अंतर्गत 102 अनुसंधान संस्थान सक्रिय हैं , जिनमें 04 समकक्ष विश्वविद्यालय ( डीम्ड यूनिवर्सिटीज ) , 55 राष्ट्रीय / केंद्रीय संस्थान , 14 राष्ट्रीय अनुसंधान केंद्र , 06 राष्ट्रीय ब्यूरो और 13 निदेशालय / परियोजना निदेशालय शामिल हैं । साथ ही , विभिन्न जिंसों और अन्य विषयों पर केंद्रित 60 अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजनाएं ( एआईसीआरपी ) भी कृषि अनुसंधान में योगदान कर रही हैं । कृषि शिक्षा के संदर्भ में देश के राज्यों में 63 राज्य कृषि विश्वविद्यालय और 03 केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय कृषि शोध एवं प्रबंधन के लिए कुशल मानव संसाधन के विकास का कार्य कर रहे हैं । नवीनतम कृषि विज्ञान व तकनीकों का किसानों तक प्रसार के लिए आईसीएआर के नेतृत्व में 723 कृषि विज्ञान केंद्र जमीनी स्तर पर खेत - खलिहानों में कार्य कर रहे हैं , जबकि उनके प्रबंधन के लिए क्षेत्रीय - स्तर पर 11 कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थानों का गठन किया गया है । कृषि अनुसंधान , शिक्षा एवं प्रसार की इस व्यापक व्यवस्था को राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली ( नार्स ) का नाम दिया गया है । देश के कृषि अनुसंधान एवं विकास को सशक्त बनाने के लिए आईसीएआर के अलावा वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद ( सीएसआईआर ) , भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र ( बीएआरसी ) , विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ( डीएसटी ) , जैव प्रौद्योगिकी विभाग ( डीबीटी ) तथा राज्य स्तर की अनेक शोध संस्थानों / परिषदों / विभागों के तत्वाधान में भी कृषि अनुसंधान कार्य जारी हैं । इसके अतिरिक्त , सामान्य वर्ग के अनेक विश्वविद्यालयों में भी कृषि संकायों का गठन किया गया है , जहां उच्चस्तरीय कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान का कार्य किया जाता है ।
आजादी की चुनौती , अनुसंधान की नींव
सन् 1947 में भारत को आजादी के साथ भूख और अकाल विरासत में मिले थे । वस्तुतः भारत का जन्म सन् 1942-43 के भयंकर बंगाल दुर्भिक्ष के साये में हुआ था , जिसमें पूर्वी भारत में लगभग 20 लाख लोग भुखमरी के शिकार हुए थे । इसलिए देश की आबादी को भुखमरी के चंगुल से मुक्त करना और सभी को पर्याप्त भोजन उपलब्ध कराना स्वतंत्र भारत की पहली और सबसे बड़ी चुनौती थी । बंटवारे में पंजाब के प्रमुख गेहूं उत्पादक क्षेत्र
पाकिस्तान के हिस्से में चले गए और पूर्वी भारत के धान उत्पादक क्षेत्र पूर्वी पाकिस्तान की मिल्कियत बन गए । बर्मा से आने वाली चावल की विशाल आपूर्ति भी राजनीतिक कारणों से बंद हो गई । इस विकट समय में प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कृषि विज्ञान एवं अनुसंधान पर विशेष बल देते हुए घोषणा की , ' सब कुछ प्रतीक्षा कर सकता है , परंतु कृषि नहीं । साथ ही उन्होंने कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए सिंचाई तथा अन्य बुनियादी सुविधाओं के विकास पर भी जोर दिया । पहली पंचवर्षीय योजना ( 1951-56 ) में कृषि उत्पादन बढ़ाने को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई , जिससे कृषि उत्पादन 1950-51 के 54 मिलियन टन से बढ़कर योजना के अंत में 65.8 मिलियन टन तक पहुंच गया । परंतु यह वृद्धि अनाज की मांग को देखते हुए अपर्याप्त थी । देश में अन्न संकट लगातार विकराल होता जा रहा था । इस गंभीर और चुनौतीपूर्ण परिदृश्य में तत्कालीन कृषि अनुसंधान की स्थिति अत्यंत सीमित थी । ब्रिटिश राज में कृषि अनुसंधान की विधिवत शुरुआत करने का श्रेय तत्कालीन ' वायसराय ऑफ इडिया ' लार्ड कर्जन को जाता है । सन् 1899 से 1900 के बीच हुए अनेक अकालों ने लॉर्ड कर्जन को विश्वास दिला दिया था कि भारत को अकाल और भूख से मुक्त करने का रास्ता कृषि विज्ञान एवं अनुसंधान से होकर गुज़रता है । फलस्वरूप सन् 1905 में पूसा , बिहार में भारत के पहले समग्र कृषि अनुसंधान संस्थान की स्थापना की गई । इसे इम्पीरियल कृषि अनुसंधान संस्थान का नाम दिया गया । साथ ही , सन् 1901 से 1905 के बीच कानपुर , पुणे , सबौर , नागपुर , लायलपुर और कोयंबटूर में भी कृषि कॉलेज की स्थापना की गई , परंतु इनका मुख्य कार्यक्षेत्र कृषि शिक्षा तक सीमित था । कृषि अनुसंधान को एक व्यापक आधार देने के लिए ' रॉयल कमीशन ऑन एग्रीकल्चर ' की सिफारिश पर सन् 1929 में इम्पीरियल कौंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च ' की स्थापना की गई । आजादी मिलने पर इसका नाम ' इंडियन कौंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च ' यानी ' आईसीएआर ' कर दिया गया । पूसा , बिहार में भूकंप से भयंकर तबाही के बाद इसे सन् 1936 में दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया और तब से यह आईसीएआर के अंतर्गत प्रमुख फसल अनुसंधान संस्थान के रूप में कार्यरत है । भारत पशुपालन के समेकित स्वरूप को देखते हुए सन् 1889 में पुणे में वैक्टीरियोलॉजी लेबोरेटरी स्थापित की गई . जिसे सन् 1893 में मुक्तेश्वर , नैनीताल स्थानांतरित कर दिया गया । इसकी गतिविधियों को बढ़ाते हुए सन् 1913 में बरेली ( उत्तर प्रदेश ) के इज्जतनगर में भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान ( आईवीआरआई ) के रूप में एक विशाल अनुसंधान परिसर स्थापित किया गया । वर्तमान में यह आईसीएआर के अंतर्गत सर्वप्रमुख पशु रोग व चिकित्सा अनुसंधान संस्थान है । इसी क्रम में सन् 1923 में बंगलौर में राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान ( एनडीआरआई ) की स्थापना की गई , जिसे सन् 1995 में करनाल ( हरियाणा ) स्थानांतरित कर दिया गया । यह एशिया में अपनी तरह का अकेला डेयरी अनुसंधान व शिक्षा केंद्र है ।
ब्रिटिश राज के अंतर्गत कपास , रेशम , चाय और नील पर अनुसंधान को विशेष महत्व दिया जाता था , क्योंकि इंग्लैंड के व्यापारी इनकी बेहतर गुणवत्ता की मांग करते थे । इसलिए ब्रिटिश सरकार ने अलग - अलग कृषि जिंसों ( कमोडिटी ) पर अनुसंधान के लिए सेंट्रल कमोडिटी कमेटी का गठन किया , जिनके अंतर्गत ' रिसर्च स्टेशन ' या अनुसंधान संस्थान कार्य करते थे । पहली कमोडिटी कमेटी सन् 1921 में कपास पर अनुसंधान के लिए गठित की गई । इसने बेहतर अनुसंधान करते हुए कपास की 70 सुधरी किस्में विकसित की , जिनका इग्लैंड के व्यापारियों ने स्वागत किया । इससे उत्साहित होकर जल्दी ही लाख , जूट , गन्ना , तंबाकू , नारियल , तिलहन , मसालों , काजू और सुपारी पर भी ' सेंट्रल कमोडिटी कमेटी गठित की गई , जिन्होंने स्वतंत्र रूप से अनुसंधान कार्य करना प्रारंभ कर दिया । आईसीएआर के उपाध्यक्ष इन सभी कमेटी के अध्यक्ष के रूप में मार्ग निर्देशन करते थे । यह सिलसिला सन् 1965 के प्रारंभ तक चलता रहा । इसके बाद सभी कमेटी को भंग कर दिया गया और इनके नियंत्रण में कार्य करने वाले अनुसंधान संस्थानों को आईसीएआर के प्रशासनिक नियंत्रण में हस्तांरित कर दिया गया । इस बीच , कृषि अनुसधान के योजनाकारों ने अनुभव किया कि भारत जैसे विशाल और भौगोलिक विविधता वाले देश में किसी एक स्थान पर स्थित कृषि अनुसंधान संस्थान पूरे देश के लिए उपयुक्त कृषि विधियों के विकास में सक्षम नहीं हो सकते । इसलिए एक प्रयोग के तौर पर विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में कृषि अनुसंधान को समन्वित करने के लिए कपास , तिलहन और मोटे अनाजों पर सन् 1956 में एक विशेष परियोजना शुरू की गई । यह आईसीएआर और संबंधित कमोडिटी का एक संयुक्त प्रयास और प्रक्रम था । परियोजना सफल रही और जल्दी ही देश में इस प्रकार के समन्वित अनुसंधान के लिए विभिन्न फसलों पर केंद्रित 17 केंद्र खोले गए । लगभग इसी समय भारत सरकार ने अमेरिका के रॉकफेलर फाउंडेशन के साथ मिलकर मक्का में फसल सुधार के लिए देश में समन्वित अनुसंधान की पहल की । परिणामस्वरूप सन् 1961 तक देश को मक्का के अधिक उपज देने वाले संकर प्राप्त हो गए । इस सफलता से प्रोत्साहित होकर आईसीएआर ने सन् 1965 में अनेक फसलों , विज्ञानों और नई दिशाओं पर केंद्रित अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजनाओं ( एआईसीआरपी ) की शुरुआत की , जो आज भी जारी हैं और विशिष्ट योगदान कर रही हैं । कृषि अनुसंधान को गति देने के लिए आवश्यक था कि कृषि विज्ञान में उच्च शिक्षा प्राप्त युवा उपलब्ध हों , जो कृषि अनुसंधान को अपना कॅरियर बनाएं । सन् 1948 में देश में केवल 17 कृषि कॉलेज थे , जो संबंधित राज्यों के कृषि विभाग के अधीन कार्य करते थे । सन् 1948-49 के दौरान विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग के अध्यक्ष सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने देश की विशिष्ट कृषि प्रधान दशाओं को देखते हुए ग्रामीण विश्वविद्यालयों की स्थापना की
सिफारिश की । उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने इस सिफारिश को गंभीरता से लेते हुए विशेषज्ञों की एक टीम को अमेरिका की लैंड - ग्रांट्स यूनिवर्सिटीज़ की कार्यप्रणाली जानने के लिए अमेरिका भेजा । इस टीम की सिफारिश के आधार पर उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र ( रुद्रपुर ) में एक समग्र और विशाल कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना की नींव रखी गई । इसका उद्घाटन 17 नवंबर , 1960 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने ' उत्तर प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय ' के रूप में किया । यह भारत का पहला कृषि विश्वविद्यालय था । यहां उच्च - स्तरीय कृषि शिक्षा , अनुराधान और प्रसार की व्यवस्था की गई । आज यह विश्वविद्यालय देश - विदेश में गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के नाम से विख्यात है और हरितक्रांति को सफल बनाने में इसकी भी अहम् भूमिका रही है । चौथी पंचवर्षीय योजना ( 1960-65 ) के दौरान विभिन्न राज्यों में कुल सात कृषि विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई ( उत्तर प्रदेश , उड़ीसा , राजस्थान , पंजाब , आंध्र प्रदेश , मध्य प्रदेश और कर्नाटक ) । कृषि विश्वविद्यालयों की स्थापना और संचालन में आईसीएआर ने एक मॉडल एक्ट बनाकर महत्वपूर्ण योगदान दिया । देश की बढ़ती खाद्य आवश्यकताओं के बीच कृषि अनुसंधान को अधिक संगठित और प्रभावी बनाने के उद्देश्य से भारत सरकार ने आईसीएआर के दायित्वों और कार्यप्रणाली की एक विशेषज्ञ समीक्षा करवाई , जिसकी सिफारिशों के अनुरूप सन् 1966 में आईसीएआर का पुनर्गठन किया गया । अब यह भारत सरकार द्वारा वित्तपोषित एक स्वायत्त संस्था थी , जिसका महानिदेशक एक प्रतिष्ठित कृषि वैज्ञानिक को बनाने का प्रावधान किया गया । ' सेंट्रल कमोडिटी कमेटी के सभी अनुसंधान संस्थान और रिसर्च स्टेशन इसके अंतर्गत आ गए । कुछ राष्ट्रीय - स्तर के संस्थान पहले से ही आईसीएआर के संस्थानों के रूप में कार्य कर रहे थे । आईसीएआर को राष्ट्रीय व क्षेत्रीय कृषि आवश्यकताओं के अनुरूप विभिन्न स्तरों के अनुसंधान संस्थान व केंद्र स्थापित करने की स्वायत्तता प्रदान की गई । राज्य कृषि विश्वविद्यालयों को आंशिक वित्तपोषण तथा तकनीकी मार्गनिर्देशन व उन्नयन के लिए आईसीएआर से जोड़ा गया । शीघ्र ही आईसीएआर को जमीनी स्तर पर कृषि तकनीकों के प्रसार की जिम्मेदारी भी सौंपी गई । इसे कार्यान्वित करने के लिए सन् 1973 में आईसीएआर ने एक विशेषज्ञ कमेटी का गठन किया , जिसकी सिफारिश पर देशभर के ग्रामीण जिलों में कृषि विज्ञान केंद्र ( केवीके ) स्थापित करने की योजना बनाई गई । इस क्रम में पहला कृषि विज्ञान केंद्र सन् 1974 में पुडुचेरी में तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय , कोयंबटूर के तकनीकी नियंत्रण में खोला गया । कृषि विज्ञान केंद्रों को नवीन कृषि प्रौद्योगिकियों का किसानों के खेतों पर परीक्षण , अग्रिम पंक्ति प्रदर्शन और प्रसार की ज़िम्मेदारी सौंपी गई । इस प्रकार देश में कृषि अनुसंधान , शिक्षा और प्रसार के एक समेकित , समग्र और प्रभावी नेटवर्क के विकास की
नींव पड़ी । इस परिदृश्य में कृषि को सर्वांगीण रूप में लेते हुए बागवानी , पशु विज्ञान , मत्स्य विज्ञान , कृषि इंजीनियरी , प्राकृतिक संसाधनों आदि को भी इसके अंतर्गत शामिल किया गया ।
हरितक्रांति की दस्तक , आत्मनिर्भरता का युग
स्वतंत्र भारत की प्रगति के लिए औद्योगिक विकास की आवश्यकता को देखते हुए दूसरी पंचवर्षीय योजना ( 1956--61 ) में कृषि की जगह उद्योगों को प्राथमिकता दी गई । परिणामस्वरूप सभी प्रमुख फसलों का उत्पादन गिरने लगा । दूसरी ओर , जनसंख्या में वृद्धि और जीवन स्तर में सुधार के कारण अनाज की मांग बढ़ने लगी । अनेक विदेशी विद्वानों द्वारा भारत में पुनः अकाल और भूख की आशंका जताई जाने लगी । भारत विदेशों से अन्न आयात करने के लिए विवश हो गया , जिसमें से अधिकांश पीएल -480 योजना के अंतर्गत अमेरिका से आने वाला घटिया लाल गेहूं था । सन् 1965 में भारत को भयंकर सूखा झेलना पड़ा और पाकिस्तान के साथ युद्ध भी छिड़ गया । अनाज की बेहद कमी हो गई । तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री ने देशवासियों को प्रत्येक सोमवार को अन्न ना खाने की अपील की । साथ ही . उन्होंने कृषि और कृषकों की अहम् भूमिका को रेखांकित करते हुए ' जय जवान , जय किसान ' का प्रसिद्ध नारा भी दिया । सन् 1966 में भारत को अकाल से बचाने के लिए अब तक के सर्वाधिक 10 मिलियन टन गेहूं का आयात करना पड़ा । तभी राजनीतिक कारणों से अमेरिका भी गेहूं भेजने में आनाकानी करने लगा । इसलिए तीसरी पंचवर्षीय योजना ( 1961-66 ) में देश को अन्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने का संकल्प लिया गया और इसके लिए कृषि विज्ञान व अनुसंधान को मुख्य माध्यम के रूप में चुना गया । गेहूं अनुसंधान के वैश्विक केंद्र सिमिट ' ( मैक्सिको ) में प्रतिष्ठित वैज्ञानिक डॉ . नॉर्मन बोर्लोग ने बौने गेहूं की जापानी किस्म नोरिन -10 ' के दखल से ' सोनोरा -64 और लरमा रोजो -64 ' नामक बौनी और अधिक उपजशील किस्में विकसित की । इन किस्मों को गर्म नम जलवायु वाले अनेक एशियाई देशों में उगाने की अच्छी संभावना थी । भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के तत्कालीन निदेशक डॉ . एम . एस . स्वामीनाथन ने डॉ . बोर्लोग से संपर्क कर बौनी किस्मों के एक क्विंटल बीज संस्थान में मंगाए । भारतीय दशाओं में इनकी उपज क्षमता आंकने के लिए देश के उत्तरी क्षेत्र के खेतों में इनका परीक्षण किया जाने लगा । साथ ही , इन किस्मों का आधार लेकर वैज्ञानिकों ने भारतीय कृषि दशाओं के अनुकूल कल्याण सोना ' और सोनालिका ' नामक किस्में विकसित की । डॉ . स्वामीनाथन के अनुरोध पर डॉ बोर्लोग स्वयं भारत आए और दोनों ने मिलकर मुख्य रूप से हरियाणा और पंजाब के खेतों का दौरा किया । किसानों को गेहूं की बौनी किस्मों की खेती करने के लिए प्रेरित किया तथा इसके लिए उपयुक्त कृषि विधियां भी समझाई । किसानों के खेतों पर 1000 से अधिक राष्ट्रीय प्रदर्शन आयोजित किए गए , जिनमें 4-5 टन प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त हुई , जबकि साधारण किस्मों से मात्र एक टन उपज मिलती थी । सन् 1968 में देश में लगभग 17 मिलियन टन गेहूं का उत्पादन हुआ , जो 1966 में केवल 11 मिलियन टन था । अन्न उत्पादन में इस अभूतपूर्व उछाल को हरितक्रांति का नाम दिया गया । भारतीय कृषि अनुसंधान की इस उपलब्धि की देश - विदेश में चर्चा व प्रशंसा हुई । भारत अन्न - दासता से मुक्त होकर खाद्यान्न आत्मनिर्भरता की ओर आगे बढ़ चला । देश की दूसरी मुख्य खाद्यान्न फसल धान या चावल के साथ भी सफलता की लगभग यही कहानी दोहराई गई । फिलिपींस ( मनीला ) स्थित अंतर्राष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने धान की अधिक उपजशील और बौनी किस्म आईआर -8 विकसित की और इसे अधिकांश एशियाई देशों में खेती के अनुकूल बताया । इसके बीज मंगाकर मुख्य रूप से दक्षिणी और पूर्वी क्षेत्र में खेती के लिए बांटे गए । सामान्य किस्मों की दो टन प्रति हेक्टेयर की उपज के मुकाबले इससे 6-7 टन प्रति हेक्टेयर पैदावार मिलने लगी । साथ ही इसकी फसल मात्र 105 दिनों में तैयार हो जाती थी । इस कारण किसानों ने इसे बड़े पैमाने पर अपनाना शुरू कर दिया । भारतीय वैज्ञानिकों ने ' आईआर -8 ' के दखल से इसी वर्ग की भारतीय कृषि जलवायु दशाओं के लिए कुछ विशिष्ट किस्में विकसित की , जैसे आईआर -20 . आईआर -36 , आईआर -150 । इनमें से आईआर -36 अपनी खूबियों के कारण जया ' के नाम से प्रचलित और लोकप्रिय हुई । इसने औसतन 10 टन प्रति हेक्टेयर तक की उपज दी । गहन कृषि अनुसंधान के द्वारा अधिक उपजशील किस्मों के लिए उन्नत कृषि विधियां भी विकसित
की गई , जिनमें पोषक तत्वों की खुराक , कीटनाशकों का उपयोग , सिंचाई आदि को निर्धारित किया गया । साथ ही , आवश्यकता के अनुसार अनेक फसलों की नई और उन्नत किस्मों के विकास का कार्य भी क्रमबद्ध रूप से शुरू हुआ , जो आज भी जारी है । गेहूं की उन्नत किस्मों के विकास में भारतीय कृषि अनुसंNजJIतधान संस्थान ( आईएआरआई ) ने अग्रणी भूमिका निभाकर ' एचडी ' श्रृंखला की अनेक अधिक उपजशील , गुणवत्तापूर्ण और लोकप्रिय किस्में तैयार की हैं । सन् 2019-20 के दौरान आईएआरआई की इन किस्मों का कुल उपज मूल्य लगभग 80,000 करोड़ रुपये आंका गया है । हाल में एचडी -3086 ' और एचडी -3226 ' किरमों के व्यावसायिक बीज उत्पादन के लिए 225 कंपनियों ने आईएआरआई के साथ करार किया है , जो इन किस्मों की लोकप्रियता का प्रमाण है । जब गेहूं के बढ़ते उत्पादन के सामने रतुआ रोग की विकट चुनौती आड़े आई तो अधिक उपजशील और रतुआरोधी गुणों वाली ' कॉम्बो ' किस्में तैयार की गई - एचडी -2967 ( 2011 ) , एचडी -3086 ( 2013 ) , एचडीसीएसडब्ल्यू -18 ( 2016 ) और एचडी -3226 ( 2019 ) । इस सूची की अंतिम दो किस्में संरक्षित खेती को ध्यान में रखते हुए जलवायु अनुकूलता के गुणों के साथ विकसित की गई हैं । इन किरमों की धान की कटाई के बाद लूंठ वाले खेतों में सीधे बुआई की जा सकती है । ढूंठ को जलाने की आवश्यकता नहीं रहती । इन किस्मों की सामान्य समय से थोड़ा पहले बुआई करके मार्च में कटाई की जा सकती है , जिससे ये गर्मी ( तापमान में बढ़ोतरी ) के प्रकोप से बची रहती हैं । आईएआरआई द्वारा विकसित गेहूं की किस्में देश के कुल 317 लाख हेक्टेयर गेहूं क्षेत्र में से 140 लाख हेक्टेयर से अधिक में उगाई जाती हैं । गेहूं की प्रति हेक्टेयर उत्पादकता , जो सन् 1946-47 में मात्र 669 किलोग्राम थी , अब बढ़कर 3,424 किलोग्राम के स्तर पर पहुंच गई है । वैज्ञानिक अनुसंधानों के माध्यम से विकसित धान की अधिक उपजशील व रोगरोधी किस्मों के कारण आज हमारा देश विश्व में चावल का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक और सबसे बड़ा निर्यातक है । सन् 1980-81 में देश में चावल का कुल उत्पादन 53.6 मिलियन टन था , जो सन् 2020-21 में बढ़कर 120 मिलियन टन तक पहुच गया है । इस दौरान धान के क्षेत्र में कुछ विशेष वृद्धि नहीं हुई है , उत्पादन में वृद्धि का मुख्य कारण वैज्ञानिक विधिया और अधिक उपजशील व रोगरोधी किस्में हैं । देश के प्रत्येक कृषि जलवायु क्षेत्र के लिए चावल की अनुकूल किस्में विकसित की गई हैं और बदलती जलवायु का सामना करने के लिए सूखा तथा जलभराव ( बाढ़ ) को सहने वाली किरमें भी उपलब्ध हैं । आईएआरआई ने भारत के विश्व प्रसिद्ध सुगांधित बासमती चावल की उन्नत किस्मों का विकास करके कीर्मिमान बनाया है । पूसा -1121 , पूसा -1509 , पूसा बासमती -1 , पूसा -1401 जैसी सुधरी किस्मों को बासमती उगाने वाले क्षेत्रों में व्यापक रूप से अपनाया गया है । पूसा -1121 विश्व की सबसे अधिक लंबे दाने वाली बासमती किस्म है । पूसा -1718 और पूसा -1637 नामक हाल में विकसित किस्में बैक्टीरियल और फफूंद रोग प्रतिरोधी हैं । सन् 2018-19 के दौरान बासमती चावल के निर्यात से भारत को लगभग 33,000 करोड़ रुपये के मूल्य के बराबर विदेशी मुद्रा की आय हुई है । बासमती उगाने वाले लगभग 19.40 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में से लगभग 17-18 लाख हेक्टेयर क्षेत्र पर अनुसंधान द्वारा विकसित पूसा बासमती किस्में उगाई जाती हैं । खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता के उपरांत तिलहन और दलहन उत्पादन बढ़ाने के लिए विशेष प्रयास किए गए , क्योंकि इनके आयात पर देश को बहुमूल्य विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती थी । तिलहन उत्पादन में सतत् वृद्धि के लिए सन् 1986 में बहुमुखी रणनीति पर आधारित एक राष्ट्रीय टेक्नोलॉजी मिशन शुरू किया गया , जिसमें कृषि अनुसंधान के माध्यम से प्रति हेक्टेयर उत्पादकता बढ़ाना एक प्रमुख लक्ष्य था । इसके अंतर्गत तिलहनी फसलों की नई व अधिक उपजशील किस्मों का विकास किया गया और अनुकूल कृषि विधियां भी विकसित की गई । परिणामस्वरूप अगले 10 वर्षों में खाद्य तेलों का उत्पादन 12 मिलियन टन से बढ़कर 24 मिलियन टन हो गया । तिलहन उत्पादन में यह उछाल पीली क्रांति के नाम से प्रसिद्ध है । इसमें आईएआरआई द्वारा विकसित तोरिया - सरसों की उन्नत किस्मों , जैसे पूसा बोल्ड , पूसा जयकिसान , पूसा विजय , पूसा मस्टर्ड -25 , 26 , 27 , 28 , 29 , 30 , ने अहम् भूमिका निभाई है । तोरिया - सरसों के कुल कृषि क्षेत्र में से लगभग 25 प्रतिशत क्षेत्र पर उन्नत किरमें उगाई जा रही हैं । उपयुक्त कृषि विधियां विकसित करके विदेशी खाद्य तेल फसल तेल - ताड़ ( ऑयल - पाम ) को भारत में लोकप्रिय बनाया गया है । इसी प्रकार सोयाबीन को मालवा के पठार क्षेत्र में प्रचलित किया गया है । बढ़ती मांग के कारण वर्तमान में खाद्य तेल पुनः आयात किया जा रहा है , जिस पर अंकुश लगाने के लिए उपयुक्त नीतियों के साथ कृषि अनुसंधान को भी अधिक प्रभावी तथा सशक्त बनाया जा रहा है । परिणामस्वरूप सन् 2021-21 में तिलहनों का 36.57 मिलियन टन उत्पादन अनुमानित है ( तीसरा अग्रिम अनुमान ) । दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भरता के लिए कृषि अनुसंधान के माध्यम से पिछले पांच वर्षों में दालों की 100 से अधिक उन्नत किस्में विकसित की गई और प्रमुख दालों के उन्नत बीज किसानों को बांटे गए । देश का दलहन उत्पादन सन् 2007-08 के 14.76 मिलियन टन के मुकाबले बढ़कर 24.42 मिलियन टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है ( सन् 2021-21 , दूसरा अग्रिम अनुमान ) । दलहन के उन्नत बीज उत्पादन के लिए 24 राज्यों में सीड हब ' स्थापित किए गए हैं और उन्नत कृषि विधियां विकसित करके किसानों तक पहुंचाई गई हैं । मुख्य फसलों के बीच दलहन की अंतवर्ती फसल उगाने की विधि प्रचलित करने से सार्थक लाभ हुआ है । मक्का में गुणवत्ता सुधार के लिए संकरण द्वारा क्वालिटी प्रोटीन ' मक्का के नौ संकर विकसित किए गए हैं , जिनसे पोषण सुरक्षा के अभियान को मजबूती मिल रही है । आईसीएआर के अनुसंधान संस्थान में विकसित गन्ना की ' को ' श्रृंखला की किस्में देश में मधुर क्रांति की सूत्रधार बनी हैं । बेहतर उपज और शर्करा प्राप्ति की उच्च दर के कारण देश के लगभग 99 प्रतिशत क्षेत्र पर ' को ' किस्में उगाई जाती हैं । उत्तरी भारत के लगभग 65 प्रतिशत क्षेत्र पर अकेले ' को -0238 किस्म उगाई जाती है , जिसकी शर्करा प्राप्ति दर लगभग 12 प्रतिशत है । दूसरी ओर , दक्षिण भारत में ' को -86032 ' किस्म की लोकप्रियता चरम पर है । ' को ' श्रृंखला की किस्में अनेक एशियाई और अफ्रीकी देशो में भी लोकप्रिय हैं । फलों और सब्जियों के उत्पादन तथा उत्पादकता में वृद्धि द्वारा देश को पोषण सुरक्षा की ओर अग्रसर करने के लिए एक व्यापक अनुसंधान द्वारा फलों , सब्जियों , मसालों आदि की 1600 से अधिक उन्नत किस्में विकसित की गई हैं । इनके प्रसार से केला , अंगूर , आलू , प्याज , इलायची , अदरक आदि की प्रति हेक्टेयर उत्पादकता सार्थक रूप से बढ़ गई है । अंगूर , केला , कसावा , मटर और पपीता आदि की उत्पादकता के संदर्भ में हम विश्व में पहले स्थान पर हैं । भारतीय फलों और सब्जियों की विदेशी बाजारों में बढ़ती मांग को देखते हुए निर्यात - उपयुक्त तथा प्रसंस्करण - उपयुक्त किस्मों का विकास किया गया । बायो - टेक्नोलॉजी के उपयोग से टमाटर और बैंगन की ' ट्रांसजीनिक ' यानी पराजीनी किस्में विकसित की गई हैं , जो अनेक रोगों के प्रति रोधी हैं और अधिक उपज भी देती हैं । फलों और सब्जियों की उत्तम गुणवत्ता वाली रोपण सामग्रियों की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती थी , जिसके समाधान के लिए सूक्ष्म प्रवर्धन तकनीकें यानी ' टिशू कल्चर ' तकनीक विकसित की गई । इससे कम समय और कम लागत में बड़ी संख्या में गुणवत्तापूर्ण पौध तैयार की जा रहीं हैं । फलों के पुराने और लगभग अनुत्पादक बागों के जीर्णोद्धार की तकनीक से पुराने बाग भी अब फलों से लदने लगे हैं । कुछ फलों में सघन बागवानी प्रणाली से उत्पादकता में सार्थक सुधार हुआ है । फलों , फूलों और अधिक मूल्य वाली
सब्जियों की संरक्षित खेती ( पॉलीहाउस या ग्रीनहाउस में खेती ) की तकनीकों ने उपज की गुणवत्ता को सुधारा है और बेमौसमी उत्पादन की राह भी खोल दी है । बागवानी फसलों में जैव - कीटनाशकों के उपयोग से हानिकारक रासायनिक कीटनाशकों के इस्तेमाल में कमी आई है । आईसीएआर के संस्थान द्वारा विकसित अनार की भगवा किस्म ने अनार के उत्पादन और उत्पादकता को कई गुना बढ़ाकर इसे सर्वसुलभ बना दिया है । सन् 2003-04 में विकसित इस किस्म के कारण सन् 2016-17 तक अनार के कुल क्षेत्र में लगभग 123 प्रतिशत , उत्पादन में लगभग 280 प्रतिशत , उत्पादकता में लगभग 70 प्रतिशत और निर्यात में लगभग 382 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है । यह बागवानी अनुसंधान की एक प्रमुख सफलता की कहानी है ।
श्वेत और नीली क्रांति
सन् 1950 और सन् 1960 के दशक में भारत को अनाज की तरह दूध का भी आयात करना पड़ता था । सन् 1970 में लांच की गई ' ऑपरेशन फ्लड ' नामक महत्वाकांक्षी योजना और बहुमुखी रणनीतियों के कारण दूध उत्पादन में निरंतर बढ़ोत्तरी हुई और सन् 1998 में अमेरिका को पीछे छोड़कर भारत ने विश्व में सर्वाधिक दूध उत्पादन का कीर्तिमान स्थापित किया , जो आज भी बना हुआ है । वर्तमान में देश का दूध उत्पादन लगभग 200 मिलियन टन के रिकॉर्ड स्तर पर है , जबकि दूध उपलब्धता 400 ग्राम प्रतिदिन प्रति व्यक्ति के ऊपर निकल गई है । यह उपलब्धि श्वेतक्रांति के नाम से प्रसिद्ध है । पशु विज्ञान और अनुसंधान ने इस उपलब्धि तक पहुंचाने में अहम् भूमिका निभाई है । एक ओर पशुओं की देशी नस्लों के आनुवांशिक सुधार का बीड़ा उठाया गया तो दूसरी ओर , पशुपोषण और पशु रोग प्रबंध व चिकित्सा के क्षेत्र में भी उपयोगी अनुसंधान किए गए । पशुओं का पोषणिक स्तर सुधारने के लिए कई तकनीकें विकसित की गईं । हरे चारे की उपलब्धता और गुणवत्ता में सुधार के लिए चारा फसलों की उन्नत किस्मों का विकास हुआ और वर्ष भर हरे चारे की उपलब्धता बनाए रखने के लिए चारा कृषि मॉडल तैयार किए गए । हरे चारे के भंडारण के लिए ' साइलेज ' बनाने की तकनीक प्रभावी और उपयोगी सिद्ध हुई है । ' कम्प्लीट फीड ब्लॉक ' तकनीक के अंतर्गत चारे , खनिज आदि का संतुलित मिश्रण बनाकर इसे ब्लॉक के रूप में परिवर्तित किया जाता है , जो एक उत्तम और पोषणिक पशु आहार है । इसी प्रकार पशुओं के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक संतुलित खनिज मिश्रण और खनिज ब्लॉक भी बनाए गए हैं । अलग - अलग क्षेत्रों के लिए अलग - अलग खनिज मिश्रण तैयार किए गए है , ताकि देश के सभी पशुपालक इसका लाभ उठा सकें । पशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में व्यापक अनुसंधान द्वारा अनेक रोगों के देशी टीके और रोग की सही पहचान की किट्स तैयार की गई हैं । गाय - भैंस से लेकर भेड़ - बकरी और मुर्गियों को बैक्टीरियल तथा वायरल रोगों से बचाने के लिए विकसित टीके बड़े पैमाने पर उपयोग किए जा रहे हैं । इससे उत्पादन बढ़ने के साथ पशुपालकों की आजीविका भी सुरक्षित हुई है । निरंतर अनुसंधान और टीकों के उपयोग से भारत तीन प्रमुख पशु रोगों से मुक्त हुआ है । ये हैं पशु प्लेग यानी रिंडरपेस्ट , अफ्रीकन हॉर्स सिकनेस और संक्रामक बोबाइन प्लूरोनिमोनिया । अत्यधिक हानिकारक खुरपका - मुंहपका रोग ( एफएमडी ) के नियंत्रण के लिए तापमान स्थाई टीके का विकास किया जा रहा है । लक्ष्य यह है कि सन् 2024 तक देश को इस रोग से भी मुक्त किया जा सके ।पशुओं और पक्षियों की उन्नत नस्लों / किस्मों के विकास के साथ कृत्रिम गर्भाधान ( एआई ) की तकनीक को विकसित कर विस्तार दिया जा रहा है । इससे आनुवंशिक गुणवत्ता बनी रहती है । इसके लिए बड़े पैमाने पर वीर्य खुराक ( सीमेन डोज ) बनाने और इसके परिवहन की तकनीक मानकीकृत की गई है । ' सेक्स सॉर्टेड सीमन बनाने की तकनीक भी विकसित करके प्रसारित की जा रही है , जिससे पशुपालक मनचाहे लिंग के पशु प्राप्त कर सकते हैं । इन विट्रो फर्टिलाइजेशन ' और ' एम्ब्रयो ट्रांसफर ' जैसी आधुनिक तकनीके भी आजमाई जा रही हैं । इस संदर्भ में उल्लेखनीय है कि भारत ने सन् 2009 में भैस का पहला क्लोन विकसित कर कीर्तिमान बनाया है । इसके लिए हैंड गाइडेड क्लोनिंग ' तकनीक विकसित कर प्रयोग में लाई गई । तब से अब तक अनेक क्लोन का विकास किया जा चुका । दूसरी ओर , गाय - भैंस , बकरी , ऊंट , मुर्गियों के उन्नत जीनोमिक चयन के लिए अधिक घनत्व वाले डीएनए चिप्स भी तैयार किए गए हैं । पशुओं और पक्षियों की नस्लों / किस्मों के बीच संकरण द्वारा उन्नत किस्में विकसित करने का कार्य जारी है । विशाल समुद्र तट ( लगभग 7,510 किलोमीटर ) , नदियों --- उपनदियों के व्यापक जाल और असंख्य ताल - तलैयों की उपस्थिति के कारण भारत में मछली उत्पादन तथा अन्य जल - जीव संवर्धन की आकर्षक संभावनाएं देखी गई हैं । इसके दोहन के लिए देश के अलग - अलग भागों में , वहां की संभावना के अनुरूप , अनुसंधान संस्थान स्थापित किए गए , जिन्होंने अपने योगदान से भारत को विश्व का सबसे बड़ा मछली उत्पादक बना दिया है । विश्व के कुल मत्स्य उत्पादन में भारत की लगभग 760 प्रतिशत की हिस्सेदारी है । सन् 2014-15 से 2018-19 के बीच मछली उत्पादन की वार्षिक वृद्धि दर 7.53 प्रतिशत रही , जिससे सन् 2018-19 के दौरान 137.58 लाख मीट्रिक टन का रिकॉर्ड उत्पादन प्राप्त किया गया । मत्स्य उत्पादन में हुई यह अभूतपूर्ण वृद्धि देश में नीली क्रांति के नाम से प्रसिद्ध है । प्रभावी मत्स्य अनुसंधान के माध्यम से कार्प मछलियों के पालन की उन्नत विधियां विकसित हो गई ; जिनसे इनका उत्पादन स्तर 10-15 टन प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष तक बढ़ गया । प्रमुख भारतीय कार्प मछलियों के प्रजनन द्वारा वर्ष भर बीज उत्पादन की तकनीक विकसित की गई । रोहू मछली की एक उन्नत किस्म जयंती विकसित की गई , जिसकी वृद्धि कर सामान्य रोहू से 17 प्रतिशत अधिक रिकॉर्ड की गई है । ठंडे पानी में मछली पालन को बढ़ावा देने के लिए ट्राउट और महसीर जैसी लोकप्रिय मछलियों के प्रजनन और बीज उत्पादन की विधियां विकसित की गई हैं । नमभूमि के तालाबों में ' पेन कल्चर ' के माध्यम से मत्स्य उत्पादन को 100-200 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष से बढ़ाकर 1000 किलोग्राम के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचाना मत्स्य अनुसंधान की एक प्रमुख उपलब्धि है । समुद्र और नदियों , झीलों में पिंजड़ा पालन ( केज कल्चर ) की नई तकनीक विकसित करके प्रसारित की गई ।
पिछले दो वर्षों में मछुआरों को तकनीकी सहायता देकर 2,000 से अधिक पिंजड़े लगाए गए । मछलियों की विभिन्न अवस्थाओं के लिए उपयुक्त पोषक आहार विकसित किए गए हैं , जिनसे उनकी वृद्धि दर में तेजी आती है । मछलियों में रोग प्रकोप पर निगरानी रखने के लिए एक विस्तृत प्रणाली विकसित की गई है , जो वर्तमान में 100 से अधिक जिलों में लागू है । मछलियों से मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए लाभदायक 19 न्यूट्रास्यूटिकल्स और अनेक मूल्यवर्धित उत्पाद विकसित किए गए हैं । हरितक्रांति और बागवानी उत्पादन से लेकर श्वेत और नीली क्रांति तक को सफल बनाने में यंत्रों और उपकरणों ने अहम् भूमिका निभाई है । अकेले आईसीएआर ने 300 से अधिक प्रौद्योगिकी विकसित करके निर्माताओं को इनके निर्माण के लिए लाइसेंस प्रदान किए हैं । इनसे कृषि कार्य अधिक तत्पर , कुशल और लागत प्रभावी बने हैं तथा श्रम और मशक्कत में कमी आई है । देश में यंत्रों / उपकरणों की मदद से बड़ी संख्या में कृषि प्रसंस्करण केंद्र भी स्थापित किए गए हैं । यंत्रों की सहायता से कटाई - उपरांत उपज नुकसान को कम करने में भी सहायता मिली है । इसी प्रकार कृषि विज्ञान एवं अनुसंधान के क्षेत्र में डिजिटल / आईटी तकनीकों का उपयोग कृषि के परिदृश्य को बदल रहा है । अनेक फसलों की कृषि विधियों तथा कृषि सूचनाओं ( मौसम , बाजार , सुविधाएं आदि ) के लिए मोबाइल ऐप और पोर्टल तैयार किए गए हैं , जो किसानों की मदद कर रहे हैं । कृषि , पशुपालन और मात्स्यिकी के क्षेत्र में एआई ( कृत्रिम बुद्धिमता ) का उपयोग किया जा रहा है , जिससे संसाधनों का कुशल और सामयिक उपयोग संभव हो पाया है । फरालों की निगरानी , रोग नियंत्रण तथा अन्य उद्देश्यों के लिए ड्रोन्स का उपयोग भी तेजी से लोकप्रिय हो रहा है ।
सदाबहार क्रांति की ओर
कृषि अनुसंधान एवं विकास ने पिछले 75 वर्षों की यात्रा के दौरान अनेक क्रांतियों के माध्यम से भारत को कृषि के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्रदान की है । अनेक कृषि जिंसों में हम आत्मनिर्भरता से आगे निकलकर निर्यात में सक्षम बने हैं । परंतु कृषि के विकास के समक्ष अनेक चुनौतियां भी हैं , जैसे कृषि जोतों का क्रमशः घटता आकार , जलवायु परिवर्तन और तापमान में वृद्धि , प्राकृतिक संसाधनों में लगातार क्षरण आदि । ये चुनौतियां खाद्य सुरक्षा और पोषण सुरक्षा के लिए खतरा हैं । इसलिए भारत में हरितक्रांति के अग्रदूत डॉ . एम . एस . स्वामीनाथन ने सदाबहार क्रांति का आह्वान किया है । यानी एक ऐसी कृषि क्रांति जिसमें उत्पादकता में सतत् वृद्धि के साथ चुनौतियों का समाधान भी समाहित हो । आजादी के - अमृत महोत्सव के अवसर पर कृषि में ' सदाबहार क्रांति की आशा और संकल्प के साथ देश आगे बढ़ रहा है ।
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