भारत में कृषि : पुनरावलोकन और संभावनाएं
तीन प्रमुख चुनौतियों की पहचान की गई है जिनसे आने वाले वर्षों में भारतीय कृषि को निपटना होगा । पहली चुनौती कृषि विपणन की है । दूसरा मुद्दा उत्पादन स्तर बनाए रखने का है और तीसरा , पोषण सुरक्षा हासिल करने पर केंद्रित है । तीनों लक्ष्य आपस में जुड़े हुए हैं और इन अंतर्संबंधों को ध्यान में रखते हुए नीति तैयार की जानी चाहिए । गेहूं और चावल में हमारी सफलता की कहानी हमें कई सबक देती है-- कुछ दोहराने के लिए . कुछ शायद परिष्कृत करने के लिए ।
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भारत एक समय में खाद्यान्न की कमी वाला देश होने से लेकर अतिरिक्त खाद्यान्न वाला देश बनने तक का लंबा सफर तय कर चुका है । आज़ादी के बाद के वर्षों में खाद्यान्न की कमी आम बात थी । उत्पादकता एक ऐसी समस्या थी जिससे भारत जूझ रहा था । अधिकांश फसली क्षेत्र के वर्षा सिंचित होने के कारण मानसून देश में उत्पादन का एक महत्वपूर्ण निर्धारक था और उसके अनुसार देश में खाद्यान्न की ज़रूरत घटती - बढ़ती रहती थी । उर्वरकों का प्रयोग लगभग न के बराबर था । सुनिश्चित सिंचाई का अभाव और उर्वरकों तथा कीटनाशकों की अनुपलब्धता ने भारत की खाद्यान्न उत्पादकता पर अंकुश लगा रखा था । भारत के लिए खाद्य सुरक्षा हासिल करने के लिए प्रौद्योगिकी ही एक विकल्प था । गेहूं और चावल की नई किस्में , सिंचाई में निवेश , उर्वरकों और कीटनाशकों की उपलब्धता में बढ़ोत्तरी के परिणामस्वरूप उत्पादकता और खाद्यान्न की उपलब्धता में भारी वृद्धि हुई है । इन उपलब्धियों के बावजूद भारत एक बार फिर दोराहे पर है । हालांकि भारत ने खाद्य सुरक्षा हासिल कर ली है पर पोषण सुरक्षा अभी भी पहुंच से दूर बनी हुई है । पर्यावरणीय तर्क प्रस्तुत किए गए हैं जिनके अनुसार कड़ी मेहनत की बदौलत हासिल खाद्य सुरक्षा के लाभ कम न हों , यह सुनिश्चित करने के लिए तत्काल कदम उठाने की आवश्यकता है ।
परिस्थितियों में आमूल परिवर्तन : खाद्य सुरक्षा हासिल करना
भारत में 1964-65 और 1965-66 में अकाल भी पड़ा । आज़ादी के बाद से भारत की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक बड़े पैमाने पर अकाल का न पड़ना रहा है । लेकिन केवल 1960 के दशक से भारत ने खाद्यान्न की कमी से निपटने के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किए थे । 1950 और 1960 के दशक में उच्च उपज देने वाली किस्मों ( एचवाईवी ) के विकास और उर्वरकों एवं कीटनाशकों के प्रयोग पर पहले से ही अनुसंधान चल रहा था । हालांकि 1960 के दशक के मध्य तक , जब देश में हरितक्रांति हुए अच्छी तरह से और सही मायने में चल रही थी , तब तक इन पहलों को बड़े पैमाने पर लागू करना बाकी था । परिणाम सबके सामने थे । 1951 में गेहूं की पैदावार 663 किग्रा / हेक्टेयर और चावल की 668 किग्रा / हेक्टेयर थी । 1964 तक गेहूं की पैदावार में मामूली सुधार यानी 730 किग्रा / हेक्टेयर हुआ । 1972 तक गेहूं की पैदावार 1,380 किग्रा / हेक्टेयर और चावल की 1,141 किग्रा / हेक्टेयर हो गई थी । 2019 में चावल की पैदावार और अधिक बढ़कर 2,659 किग्रा / हेक्टेयर और गेहूं की 3,507 किग्रा / हेक्टेयर हो गई । उत्पादकता में इस वृद्धि के कारण खाद्यान्न की प्रति व्यक्ति शुद्ध उपलब्धता में उल्लेखनीय सुधार हुआ है । 1951 में उपलब्धता 394.9 ग्राम / दिन थी जो 2020 तक बढ़कर 512.6 ग्राम / दिन हो गई है । यह देखते कि आजादी के बाद से हमारी आबादी लगभग चौगुनी हो गई है , यह एक प्रभावशाली उपलब्धि है । औपचारिक ऋण के प्रावधान ने उत्पादकता में वृद्धि को सक्षम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । ऋण की उपलब्धता ने किसानों को अपनी उत्पादकता बढ़ाने के लिए आवश्यक आदानों की खरीद में समर्थ बनाया । 1970 में राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड ( एनडीडीबी ) के द्वारा शुरू किए गए ऑपरेशन फ्लड के माध्यम से दूध के उत्पादन में भी ऐसी उपलब्धि हासिल की गई थी । दूध उत्पादन , जो 1951 में 17 मिलियन टन था , 1969 तक मामूली वृद्धि के साथ 21.2 मिलियन टन हो गया । ऑपरेशन फ्लड की शुरुआत के साथ दूध उत्पादन में तेज़ी से वृद्धि हुई । 1980 तक दूध का उत्पादन बढ़कर 30.4 मिलियन टन हो गया । 1997 तक भारत दुनिया में दूध का सबसे बड़ा उत्पादक देश था । 2019 में भारत ने 187.7 मिलियन टन का उत्पादन दर्ज किया और दुनिया में सबसे बड़ा दूध उत्पादक होने का अपना रिकॉर्ड बनाए रखा । हरितक्रांति के साथ - साथ हमने भारत में उसी दौर में श्वेतक्रांति भी देखी । नीति के नज़रिए से केवल उन्नत प्रौद्योगिकियों की उपलब्धता ही एकमात्र कारण नहीं था । कृषि विपणन और सार्वजनिक खरीद और वितरण के क्षेत्र में बड़े कदम उठाए गए । ऐसे अधिक विनियमित बाज़ारों की आवश्यकता थी जहां किसान पारदर्शी मूल्य खोज तंत्र के माध्यम से अपनी उपज को बेचने के लिए ला सकें । राज्य का विषय होने के कारण राज्य सरकारों ने 60 और 70 के दशक के दौरान कृषि उत्पाद बाजार विनियम ( एपीएमआर ) अधिनियम बनाए । इन विनियमों के माध्यम से स्थापित कानूनी ढांचे का आशय था कि कृषि उपज केवल इन बाजारों में लाइसेंस प्राप्त और पंजीकृत व्यापारियों द्वारा ही खरीदी जा सकती थीं । इन विनियमों का आशय यह भी था कि कोई भी व्यक्ति जो लाइसेंस प्राप्त और पंजीकृत व्यापारी नहीं था , वह किसानों से खरीद नहीं कर सकता था और सभी लेन - देन निर्दिष्ट मार्केट यार्डों में किए जाएंगे । इन विनियमों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि कृषि व्यापार पारदर्शी , निर्वाध और निष्पक्ष तरीके से किया जाए जिसमें इन विनियमों के प्रमुख परिणाम के रूप में किसानों को पर्याप्त मेहनताना मिले । उसी दौरान एक व्यापक सार्वजनिक खरीद और वितरण प्रणाली स्थापित की गई थी । भारतीय खाद्य निगम ( एफसीआई ) की स्थापना 1965 में मूल्य समर्थन गतिविधियों का संचालन करने , सार्वजनिक वितरण प्रणाली ( पीडीएस ) के तहत खाद्यान्न वितरित करने और खाद्यान्नों के बफर स्टॉक को बनाए रखने के लिए की गई थी । न्यूनतम समर्थन मूल्य ( एमएसपी ) कृषि मूल्य आयोग के माध्यम से निर्धारित किए जाते थे जिसे 1980 के दशक में कृषि लागत और मूल्य आयोग ( सीएसीपी ) का नया नाम मिला । पीडीएस में वितरित किए जाने वाले प्रमुख खाद्यान्नों की खरीद एमएसपी पर हुई । इन फसलों की एमएसपी पर खरीद ने उनकी खेती को और भी प्रोत्साहित किया जिससे देश में खाद्यान्न की उपलब्धता में वृद्धि हुई । हालांकि पीडीएस प्रणाली में तब से कई बदलाव हुए हैं लेकिन लक्ष्य एक ही है- भारत के गरीबों को रियायती दरों पर खाद्य और गैर - खाद्य वस्तुओं का वितरण सुनिश्चित करना । राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम , 2013 के साथ इस दायरे का काफी विस्तार हुआ । दूध उत्पादन के मामले में सहकारी मॉडल ने अद्भुत काम किया । यह मॉडल गुजरात के आणंद में विकसित और परिपूर्ण हुआ जिसे देश के कई हिस्सों में अपनाया गया ।
नई प्रणाली की आवश्यकता
जैसे - जैसे हम खाद्य सुरक्षा हासिल करने की ओर बढ़े , ऐसे कई मुद्दे सामने आए जो भारत के कृषि क्षेत्र के दीर्घकालिक विकास के लिए हानिकारक हैं । पहली बड़ी बाधा कृषि विपणन में सामने आई । समय के साथ किसानों की सुरक्षा के लिए बनाई गई व्यवस्था इसका उलट करने लगी थी । बाजारों की संख्या बढ़ाने में विफलता हाथ लगी और व्यवस्था में मौजूद बिखराव ने कृषि वस्तुओं की आवाजाही और व्यापा jiर में अक्षमताएं पैदा कर दी । बाजारों का पारदर्शी मूल्य खोज का माध्यम बनने की उम्मीद थी , लेकिन होने इसके विपरीत लगा । केवल लाइसेंस प्राप्त व्यापारियों को इन बाजारों से खरीद में सक्षम होने के कारण इन व्यापारियों ने अक्सर नए व्यापारियों के इन बाजारों में प्रवेश को अवरुद्ध कर दिया और खुली नीलामी में शामिल होने के बजाय ( जैसाकि परिकल्पना की गई थी ) कीमतों को तय करने के लिए मिलीभगत से काम किया । कमीशन एजेंटों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होने लगी । बाजारों के बहुधा गांवों से दूर होने के कारण कमीशन एजेंटों ने किसानों और व्यापारियों के बीच वाहक के रूप में काम किया । मध्यस्थता की लागत , बिखराव और बिचौलियों की उपस्थिति के कारण अंतिम खुदरा कीमतों के एक बड़े हिस्से को हथिया लिया जाता जिससे किसानों का हिस्सा छोटा होता गया । मूल्य श्रृंखला में निवेश की कमी भी थी विशेष रूप से निजी निवेश की । देश को 90,000 करोड़ रुपये सालाना का फसल के बाद ( पोस्ट हार्वेस्ट ) नुकसान होने का अनुमान लगाया गया था । खाद्य प्रसंस्करण और निर्यात बाजारों से जुड़ाव भी कमज़ोर रहा ।
तीन कृषि बिलों के रूप में सरकार द्वारा शुरू किए गए सुधारों का उद्देश्य कृषि विपणन में इन अंतर्निहित अक्षमताओं को दूर करना था । साथ ही , राज्य सरकारें अधिक उदार व्यापारिक वातावरण की दिशा में अपने स्वयं के कृषि उपज बाजार समिति ( एपीएमसी ) अधिनियमों में संशोधन कर रही हैं । कृषि में बुनियादी ढांचे के निर्माण को और मजबूती प्रदान करने के लिए एक लाख करोड़ रुपये का कृषि अवसंरचना कोष ( एआईएफ ) भी बनाया गया है जिसमें मौजूदा एपीएमसी मार्केट यार्ड भी शामिल हैं । दूसरी बाधा या कमी कृषि उत्पादन में स्थिरता के क्षेत्र में सामने आई है । इसमें कोई संशय नहीं है कि जलवायु परिवर्तन का खतरा हम पर मंडरा रहा है और इससे फसलों की पैदावार प्रभावित होने की संभावना है । इसे कम करने और इसके अनुकूल कार्यनीतियां अपनाना समय की मांग हैं । उत्पादन में अक्षम और अव्यवहार्य परिपाटिया कई पर्यावरणीय मुद्दों का कारण बनीं । बाढ़ सिंचाई . एकतरफा उर्वरक प्रयोग और अत्यधिक उर्वरक उपयोग चंद उदाहरण हैं । मसलन कृषि न केवल ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के माध्यम से बल्कि पराली जलाने से भी वायु प्रदूषण में योगदान करती है । कि हमारे उत्पादन - स्तर को बनाए रखने के लिए मिट्टी की गुणवत्ता का खराब होना शायद सबसे बड़ी चुनौती है । मृदा जैव कार्बन व ( एसओसी ) के स्तर में , जो मिट्टी की गुणवत्ता का एक महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है , पूरे भारत में गिरावट देखी गई है । मृदा स्वास्थ्य कार्ड ( एसएचसी ) योजना से उपलब्ध आंकड़ों से पता चला है कि योजना के आरंभ के समय चक्र I ( 2015-17 ) के दौरान एसओसी के लिए सभी नमूनों में औसत 9 प्रतिशत में एसओसी स्तर बहुत कम निकला और औसत 33 प्रतिशत नमूनों में एसओसी स्तर ' कम ' निकला । इसका तात्पर्य यह है कि एसएचसी के पहले चरण के तहत परीक्षण किए गए सभी नमूनों में से आधे से थोड़े कम में एसओसी का स्तर कम या बहुत कम देखा गया । चक्र II ( 2017-19 ) में कुछ सुधार देखा गया । ऐसे नमूने जिनमें एसओसी का स्तर बहुत कम था , वे 9 प्रतिशत से घट कर 7.8 प्रतिशत हो गए , जबकि जो नमूने जिनमें एसओसी का स्तर कम था , उनका अनुपात घटकर 31.6 प्रतिशत हो गया जो मामूली सुधार दर्शाता है । राष्ट्रीय कृषि विज्ञान अकादमी ( एनएएएस ) में कई वैज्ञानिकों द्वारा उर्वरक उपयोग में असंतुलन और मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट के बीच संबंध की जांच की गई है । यह पाया गया कि उर्वरकों के उपयोग में असंतुलन का मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट में योगदान रहा है । नाइट्रोजन उर्वरकों की खपत , दूसरों की तुलना में प्रमुख कारण रहा है । उदाहरण के लिए पंजाब में निर्धारित 4 : 1.6.1 एनःपी के अनुपात के बजाय वास्तविक उपयोग 33.9 : 7.9 : 1 था जो असंतुलन को दर्शाता है । ऐसा ही एक मामला
हरियाणा में सामने आया जहां 4.01.7 : 1 के निर्धारित अनुपात के बजाय वास्तविक उपयोग 22.6-6.2-1 था । जल एक अन्य क्षेत्र है जहां तत्काल कदम उठाने की आवश्यकता है । कई क्षेत्रों में भूजल - स्तर कम हो रहा है क्योंकि निकासी की गति पुनर्भरण की गति से अधिक है । वर्ष 2017 में केंद्रीय भूजल संसाधन बोर्ड द्वारा मूल्यांकन से ज्ञात हुआ कि सभी भूजल आकलन इकाइयों में से लगभग 17 प्रतिशत का अत्यधिक दोहन किया गया जिसका अर्थ है कि जलस्तर गिर रहा है । पंजाब , राजस्थान , दिल्ली और हरियाणा भूजल संसाधनों के अत्यधिक दोहन के उच्चतम स्तर वाले राज्य थे । प्रति वर्ष निकाले जाने वाले सभी भूजल का लगभग 90 प्रतिशत कृषि कार्यों के लिए है । सिंचाई के लिए इस्तेमाल होने वाले जल का लगभग दो तिहाई हिस्सा भूजल है । भारत में किसानों द्वारा उपयोग की जाने वाली जबकि पारपरिक बाढ़ सिंचाई प्रणाली सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों की तुलना में अक्षम है । सूक्ष्म सिंचाई की दक्षता से जल का उपयोग कम हो जाता है । यह 30-60 प्रतिशत तक होता है जो सिंचाई की विधि ( ड्रिप या स्प्रिंकलर ) पर निर्भर करता है । 1 खाद्य सुरक्षा की पहली बाधा को पार करने के बाद पोषण सुरक्षा अब अगला मोर्चा है जिस 1 पर हमें विजय प्राप्त करने की आवश्यकता है । राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 4 ( 2015-16 ) के अनुसार 5 वर्ष से कम उम्र के 35.7 प्रतिशत बच्चे कम वजन के थे और 38.4 प्रतिशत अविकसित थे । व्यापक राष्ट्रीय पोषण सर्वेक्षण ( सीएनएनएस ) 1 2016-18 में कम वज़न और नाटापन ( स्टंटिंग ) क्रमशः 334 प्रतिशत और 34.7 प्रतिशत में पाया गया । इसे संज्ञान में लेते हुए सरकार ने सबसे पहले पोषण अभियान और मिशन पोषण 20 की शुरुआत की । टाटा कॉर्नेल इंस्टीट्यूट ( टीसीआई ) के अनुसार कृषि और पोषण परिणाम का परस्पर सम्बन्ध है । पहली व्यवस्था घरेलू आय प्रभाव के माध्यम से बनी है जिससे अधिक विविध और पौष्टिक खाद्य पदार्थों , बेहतर स्वास्थ्य और स्वच्छता सुविधाओं तक परिवारों की पहुंच में सुधार होता है । दूसरी व्यवस्था अधिक विविध खाद्य पदार्थों तक पहुंच से संबद्ध है । टीसीआई के अनुसार आहार में कम विविधता को नाटेपन और मोटापे दोनों से जोड़ा गया है । बायोफोर्टिफिकेशन एक अन्य कड़ी है ।
जबकि भारत ने उत्पादकता में । महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल कर ली हैं , सतत उत्पादन को व्यापारिक लेन - देन में परिवर्तित किया जा सकता है जिसमें भारत अब संभवतः समर्थ है । मृदा की गुणवत्ता में गिरावट और जलस्तर के घटने जैसी गंभीर स्थितियों से निपटने के लिए तत्काल 1 कदम उठाना आवश्यक थे
नए प्रतिमान की आवश्यकता
तीन प्रमुख चुनौतियों की पहचान की गई है जिनसे आने वाले वर्षों में भारतीय कृषि को निपटना होगा । पहली चुनौती कृषि विपणन की है । दूसरा मुद्दा उत्पादन - स्तर बनाए रखने का है । तीसरा पोषण सुरक्षा हासिल करने पर केंद्रित है । तीनों लक्ष्य आपस में जुड़े हुए हैं और इन अंतर्संबंधों को ध्यान में रखते हुए नीति तैयार की जानी चाहिए । गेहूं और चावल में हमारी सफलता की
कहानी हमें कई सबक देती है- कुछ दोहराने के लिए , कुछ शायद परिष्कृत करने के लिए ।
प्रौद्योगिकी की भूमिका
जिस तरह भारत को 1960 के दशक में अनाज सुरक्षा हासिल करने के लिए तकनीकी सफलताओं की आवश्यकता थी , उसी के समान स्थिति आज है । आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ( एआई ) , ब्लॉकचेन , इंटरनेट ऑफ थिंग्स ( आईओटी ) जैसी उच्च प्रौद्योगिकियां आज उद्योगों में गहरी पैठ बना रही है , जैसा पहले कभी नहीं देखा गया था । स्टार्टअप के लिए एग्रीटेक या एजी - टेक सबसे लुभावने निवेश प्रस्तावों में से एक के रूप में उभरा है । बैन एंड कंपनी की एक हालिया रिपोर्ट ने भारत में एग्रीटेक के बढ़ते महत्व पर प्रकाश डाला है जबकि भारत पहले से ही तीसरा सबसे बड़ा एग्रीटेक बाजार है । इसके उपयोगों में उत्पादकता बढ़ाने से लेकर उत्पाद खोजने की क्षमता ( ट्रेसेबिलिटी ) और ऋण तक पहुंच सुनिश्चित करना शामिल है । कई कंपनियां एआई - एमएल श्वेतक्रा ( आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस- मशीन लर्निग ) मॉडल के माध्यम से उपग्रह डेटा , प्रशासनिक डेटा और मौसम डेटा का उपयोग करके पैदावार के पूर्वानुमान लगाने पर के लिए मॉडल विकसित करने में संलग्न हैं । देश की भर में कई प्रायोगिक परियोजनाएं चल रही हैं जहां हु कृषि उत्पादों की आरम्भ से अंत तक ट्रैसेबिलिटी वि प्रदान करने के लिए ब्लॉकचेन प्लेटफॉर्म विकसित ( ए किए जा रहे हैं क्योंकि यह हमारे निर्यात आधार प्रति को बढ़ाने में एक प्रमुख बाधा हैं । एआई - एमएल सह द्वारा संचालित इमेज रिकग्निशन के साथ हैंडहेल्ड उपकरणों को उत्पादों की परख और श्रेणीबद्ध करने के लिए विकसित किया जा रहा है क्योंकि यह मार्केटिंग में एक अन्य प्रमुख बाधा है । कृषि क्षेत्र के डिजिटल परिवर्तन की क्षमता को देखते हुए कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय ' आईडिया प्लेटफॉर्म विकसित कर रहा है । यह 10 करोड़ से अधिक किसानों का एक डेटाबेस है जिसके आधार पर निजी क्षेत्र ऐसे समाधान तैयार कर सकता है जिन्हें पूरे भारत में व्यापक रूप से लागू किया जा सकता है । प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग से कृषि उत्पादन को और बढ़ाया जा सकता है ।
श्वेतक्रांति में सहकारी मॉडल की सफलता प्रकट हुई । किसान समूहों की क्षमता को मान्यता देते हुए केंद्र सरकार 10,000 किसान उत्पादक संगठन ( एफपीओ ) बनाने के लिए प्रतिबद्ध है । हाल ही में गठित सहकारिता मंत्रालय किसान समूहों को मजबूत बनाने 1 की प्रतिबद्धता का एक और प्रमाण है ।
सतत उत्पादन वृद्धि
अब जबकि भारत ने उत्पादकता में महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल कर ली हैं , सतत उत्पादन को व्यापारिक लेन - देन में परिवर्तित किया जा सकता है जिसमें भारत अब संभवतः समर्थ है । मृदा की गुणवत्ता में गिरावट और जलस्तर के घटने जैसी गंभीर स्थितियों से निपटने के लिए तत्काल कदम उठाना आवश्यक है । एक उपाय चावल और गेहूं के उत्पादन आधार को उन क्षेत्रों में स्थानांतरित करना है जहां हरितक्रांति के लाभ अभी तक नहीं पहुंचे हैं उदाहरण के लिए पूर्वी भारत में । हालांकि यह कहने में आसान है लेकिन इस पर अमल करना कठिन है क्योंकि उन किसानों के
लिए भिन्न फसलों की खेती करने के लिए प्रोत्साहन व्यवस्था तैयार करनी होगी जो वर्तमान में जल की कमी वाले क्षेत्रों में गेहूं - चावल उगा रहे हैं । कृषि जलवायु क्षेत्रीय योजना ( एसीआरपी ) एक ऐसी अवधारणा है जिसने फिर से ज़ोर पकड़ना शुरू कर दिया है । कृषि जलवायु प्रणालियों के साथ फसल प्रणालियों को समेकित करने से जैव विविधता को बढ़ावा मिल सकता है और जलवायु परिवर्तन का मुकाबला करने में भारत की अनुकूलन और शमन क्षमताओं में वृद्धि हो सकती है । कृषि पारिस्थितिकी खेती एक और अवधारणा है जिसे उत्पादन की वर्तमान प्रणाली के साथ सतत विकास संबंधी सरोकारों को देखते हुए फिर से सुर्खियों में लाया गया है । 2019 में खाद्य और कृषि संगठन ( एफएओ ) ने खाद्य सुरक्षा और पोषण पर विशेषज्ञों के एक उच्चस्तरीय पैनल ( एचएलपीई ) का गठन किया जिसने कृषि पारिस्थितिकी संबंधी सिद्धांतों को बड़े पैमाने पर अपनाने का आह्वान किया । भारत में केंद्र सरकार की योजना- परम्परागत कृषि विकास योजना ( पीकेवीवाई ) के तहत प्राकृतिक खेती को भारतीय प्राकृतिक कृषि ( मूहों पद्धति कार्यक्रम ( बीपीकेपी ) के रूप में बढ़ावा दिया देते जाता है । बीपीकेपी का उद्देश्य पारंपरिक स्वदेशी 000 पद्धतियों को बढ़ावा देना है , जो पुनःचक्रण ( रिसाइक्लिग ) , पलवार लगाने ( मल्चिंग ) . समय - समय लिए पर मिट्टी के वायु संचारण और सभी सिंथेटिक गठित रासायनिक आदानों के बहिष्करण के साथ खेत में गाय के गोबर - मूत्र से तैयार यौगिकों के उपयोग पर आधारित हैं । अब 9 राज्यों में 20 लाख से अधिक एक किसानों द्वारा प्राकृतिक कृषि पद्धतियों को अपनाया गया है । आध प्रदेश , हिमाचल प्रदेश और गुजरात जैसे राज्य इसमें अग्रणी हैं । इन पद्धतियों को अपनाने से किसानों के कल्याण और पर्यावरण संरक्षण दोनों में लाभकारी परिणामों के प्रमाण बढ़ रहे हैं । नीति आयोग एक बहुआयामी दृष्टिकोण के माध्यम से प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के प्रयासों में अग्रणी है । इनमें वैज्ञानिक मूल्यांकन , सर्वोत्तम कार्य पद्धतियों और केस स्टडीज का दस्तावेज़ीकरण , वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर के परामर्श और उत्पादों की खोज और प्रमाणीकरण के लिए तकनीकी प्रयास शामिल हैं ।
भविष्य में सफलता हासिल करने के लिए पिछली उपलब्धियों से सीख
मिसाल के तौर पर हरितक्रांति में हमारी सफलता से हासिल सबक केवल प्रौद्योगिकी के उपयोग और सिंचाई के बुनियादी ढांचे में सार्वजनिक निवेश तक ही सीमित नही है । सार्वजनिक खरीद और वितरण प्रणाली की सफलता से भी महत्वपूर्ण सबक सीखे जा सकते हैं जिनकी मांग पैदा करने और किसानों को चावल - गेहूं उगाने के लिए प्रोत्साहित करने में बड़ी भूमिका थी । सुनिश्चित खरीद और न्यूनतम समर्थन मूल्य ( एमएसपी ) ने उस समय की आवश्यकताओं के अनुसार मानक उत्पादन कार्यशैलियों को किसान समूहों के माध्यम से निष्पादित करना आसान है । कृषि अवसंरचना कोष ( एआईएफ ) के तहत एफपीओ को ऋण लेने योग्य बनाकर फसल कटाई के बाद का साझा बुनियादी ढांचा तैयार किया जा सकता है जिससे अंतिम बाज़ारों तक अधिक पहुंच संभव हो सके और बर्बादी कम हो । खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में भारत की पिछली सफलताओं से कई सबक सीखे जा सकते हैं । अनाज की निरंतर आपूर्ति और मांग को सुनिश्चित करने में उन्नत प्रौद्योगिकी , सार्वजनिक खरीद और वितरण की भूमिका महत्वपूर्ण थी । किसान समूहों के कारण भारत दुनिया में दूध का सबसे बड़ा उत्पादक बन गया है जिसकी बहुत सारी संभावनाओं का अभी भी दोहन नहीं किया गया है । अब पोषण सुरक्षा और सतत उत्पादन प्रमुख चुनौतियां हैं जिनसे निपटने की आवश्यकता है । पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थों की निरंतर मांग और आपूर्ति सुनिश्चित करने में सार्वजनिक खरीद और वितरण प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं । सतत उत्पादन वृद्धि सुनिश्चित करने के लिए कृषि पारिस्थितिकी पद्धतियों को बड़े पैमाने पर अपनाया जा सकता है । उत्पादकता बढ़ाने और उत्पाद की सुगमता और प्रमाणीकरण सुनिश्चित करने के लिए आधुनिकतम प्रौद्योगिकियों का लाभ उठाया जा सकता है जो निर्यात बाजारों के दोहन की कुंजी हैं ।
सरकारी नीति के अनुरूप किसानों को अधिक चावल - गेहूं उगाने के लिए प्रोत्साहन दिया । पीडीएस के माध्यम से इन अनाजों का वितरण अधिक मांग उत्पन्न करने के साथ उत्पादन पर अप्रत्यक्ष प्रभाव डालता है । पोषण सुरक्षा और सतत्ता के संदर्भ में मोटा अनाज जैसे बाजरा जैसी फसलें स्पष्ट रूप से अग्रणी हैं । वे अधिक पौष्टिक हैं और उन्हें उगाने के लिए कम जल की आवश्यकता होती है । हालांकि तुलनात्मक आर्थिक व्यवस्था की दृष्टि से उत्पादकता और बाज़ारों में प्राप्त कीमतों में मोटा अनाज अन्य प्रकार के अनाज से पिछड जाता है । मोटे अनाज के लिए हालांकि एमएसपी घोषित किया गया है लेकिन पीडीएस के तहत उसकी खरीद और वितरण चावल - गेहूं की तुलना में बहुत कम है । पीडीएस में बड़े पैमाने पर मोटा अनाज शामिल करने का सरकारी नीतियों और किसानों के इन फसलों की खेती करने के निर्णयों को प्रोत्साहन देने पर प्रभाव हो सकता है । साथ ही , अन्य अनाज की तुलना में मोटे अनाज की उत्पादकता बढ़ाने के लिए अनुसंधान एवं विकास ( आर एंड डी ) के प्रयासों को केंद्रित करने की आवश्यकता है । श्वेतक्रांति में सहकारी मॉडल की सफलता प्रकट हुई । किसान समूहों की क्षमता को मान्यता देते हुए केंद्र सरकार 10,000 किसान उत्पादक संगठन ( एफपीओ ) बनाने के लिए प्रतिबद्ध है । हाल ही में गठित सहकारिता मंत्रालय किसान समूहों को मजबूत बनाने की प्रतिबद्धता का एक और प्रमाण है । आगत बाजारों ( इनपुट मार्केट ) और उत्पादन बाजारों ( आउटपुट मार्केट ) दोनों में मोल - भाव की सामर्थ्य का लाभ किसान समूहों की एक प्रमुख ताकत है । यह देखते कि अपने कृषि निर्यात को बढ़ाना हमारा लक्ष्य है , निर्यात
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