शासन में ईमानदारी
{“ भ्रष्टाचार जैसी बुराइयां कहां से उत्पन्न होती हैं ? यह कभी न खत्म होने वाले लालच से आता है । भ्रष्टाचार मुक्त नैतिक समाज के लिए इस लालच के खिलाफ लड़ाई लड़नी होगी और ' मैं क्या दे सकता हूं ' की भावना से इस स्थिति को बदलना होगा । }. " डॉ एपीजे अब्दुल कलाम
5. केंद्रीय सतर्कता आयोग कानून के अलावा लोकपाल विधेयक को अधिनियमित करने की आवश्यकता और 6. आपराधिक न्यायिक प्रणाली को मजबूत करना । सुशासन विश्वास और भरोसे पर टिका होता है । शासन में ईमानदारी से सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही , पारदर्शिता और सत्यनिष्ठा सुनिश्चित किया जाना अपेक्षित है । भारत में , हमारे पास ईमानदारी से संबंधित मुद्दों के समाधान के लिए एक व्यापक विधायी और संस्थागत ढांचा है , जिसका विवरण नीचे दिया गया है :
आचारनीति ऐसा मानक है जो व्यक्तियों के व्यवह आपसंद और कार्यों को निर्देशित करने में मदद क है । यह बहुआयामी है क्योंकि यह अधिकारों , दायित्व निष्पक्षता , गुणों आदि की अवधारणा सहित समाज की मू प्रणाली द्वारा संचालित है । आचारनीति और ईमानदारी लोक प्रशार प्रणाली की आधारशिला है । आज की दुनिया में , जब सरकारें है के सामाजिक - आर्थिक विकास में सक्रिय भूमिका निभा रही सरकारी तंत्र और उसमें कार्य कर रहे कर्मियों की भूमिका अधि चुनौतीपूर्ण हो जाती है क्योंकि वे कानून और नियमों के सूत्रधार 3 प्रवर्तक दोनों हैं । दूसरों के प्रति सहानुभूति की भावना और दूसरों लिए स्वयं के आधिपत्य को सुगम बनाने वाले मूल्यों को कम स में आसानी से आत्मसात नहीं किया जा सकता है । इसके लिए स में बदलाव को जीवन भर विकसित करने की आवश्यकता होती जिम्मेदारी और जवाबदेही आचारनीति के अभिन्न अंग कानूनों और नियमों की प्रकृति जिसके माध्यम से जवाबदेही - की जाती है , समाज के नैतिक विचारों पर आधारित है । कई दे में उनके मंत्रियों , विधायकों और सिविल सेवकों के लिए आ संहिता / आचार नीति निर्धारित की गई हैं । ब्रिटेन में मंत्रिस्त संहिता , अमेरिकी सीनेट में आचार संहिता और कनाडा में मंत्रि के लिए मार्गदर्शिका है । स्पेन में मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकानि के लिए सुशासन संहिता है । इस लेख में विशेष रूप से भारत के संदर्भ में लोक प्रशासन आचार नीति की अवधारणा और संस्थागत तंत्र द्वारा ईमानदारी सुनिशि करने के तरीकों के बारे में पड़ताल करने की कोशिश की गई है । इन खंड 1 में आचार नीति की अवधारणा और इस पर विचार किया गया कि लोक प्रशासन में नैतिकता के पारिस्थितिकी तंत्र को परिभाषित का के लिए इसे विभिन्न कानूनों , नियमों और विनियमों में कैसे प्रतिष्ठा ' किया जाता है । इसके खंड 2 में अंतरराष्ट्रीय अनुभवों का वर्णन कि गया है । खंड 3 में देश में शासन में ईमानदारी को मजबूत करने लिए संस्थागत और विधायी ढांचे की चर्चा की गई है ।
खंड -1
अवधारणा :
एथिक्स यानी आचार नीति शब्द मूल ग्रीक शब्द एथिकोस से लिया गया है , जिसका अर्थ है आदत से उत्पन्न होना । - निस्संदेह , संस्कृति , मूल्य , चरित्र , और सही - गलत का ज्ञान नैतिकता - के सर्वोत्कृष्ट निर्धारक हैं । साथ ही , नीतिपरक शासन सुनिश्चित करने - के लिए संस्थानों और संस्थागत ढांचे की भूमिका को कम करके नहीं आंका जा सकता है । आचार नीति केवल उच्च नैतिक मूल्यों : की अभिव्यक्ति तक ही सीमित नहीं है , इसका संबंध सार्वजनिक है पदाधिकारियों को उनकी चूक के लिए कानूनी रूप से जवाबदेह - ठहराने के लिए तंत्र से भी है । न भ्रष्टाचार निवारण समिति ( 1964 ) : इसे संथानम समिति के नाम । से भी जाना जाता है । इसने कहा था : " नैतिक तत्परता की कमी , जो हाल के वर्षों की एक विशिष्ट । विशेषता रही है , शायद यह सबसे बड़ा एकमात्र कारक है I जो ईमानदारी और दक्षता की मजबूत परंपराओं के विकास i में बाधा डालता है । " र पदाधिकारियों को जो जनता का विश्वास और सम्मान न मिलता है , वह काफी हद तक सामूहिक प्रयासों का परिणाम है ।
सत्यनिष्ठा , ईमानदारी , वस्तुनिष्ठता के प्रमुख सिद्धांतों का पालन हितधारकों के बीच विश्वास और भरोसा बढ़ाता है । सरकारी पदाधिकारियों का आचरण सभी परिस्थितियों में निन्दा से परे होना चाहिए । उनके पेशेवर या व्यक्तिगत आचरण में कोई भी कमी उनकी व्यक्तिगत सत्यनिष्ठा और काम की गुणवत्ता की प्रतिकूलता को प्रदर्शित करती है और उनके कार्यों के बारे में संदेह पैदा करती है ।
शासन में आचार नीती
1. नैतिक व्यवहार के किसी भी तंत्र में निम्नलिखित को शामिल किया जाना चाहिए ।
2. आचार नीति मानदंडों और आचरण को संहिताबद्ध करना ।
3. सार्वजनिक हित और व्यक्तिगत लाभ के बीच टकराव से बचने के लिए व्यक्तिगत हित का खुलासा करना ।
4. प्रासंगिक संहिताएं लागू करने के लिए एक तंत्र बनाना ।
किसी सार्वजनिक अधिकारी की पद के लिए योग्यता और अयोग्यता के संबंध में मानदंड निर्धारित करना मूल्य , समाज के सभी सदस्यों को मार्ग दिखाने वाले मार्गदर्शक सितारों के रूप में कार्य करते हैं और सभी से अपेक्षा की जाती है कि वे उनका सम्मान करें और पालन करें । चूंकि वे संहिताबद्ध नहीं हैं और व्याख्या पर आधारित हैं इसलिए टकराव या संघर्ष की स्थितियां उत्पन्न होती हैं । साथ ही , संस्कृति और सभ्यता में सही और गलत की पहचान गहराई से निहित है । समाज का लोकाचार , विश्वास और भरोसे के वातावरण का निर्माण करने वाले नागरिकों के व्यवहार के तरीके से तैयार किया गया है । सत्यनिष्ठा को आचरण के विभिन्न पहलुओं को शामिल करते हुए एक समग्र अवधारणा के रूप में देखा जाना चाहिए और वित्तीय ईमानदारी तक सीमित नहीं होना चाहिए । सार्वजनिक पद को एक ट्रस्ट के रूप में माना जाना चाहिए जो पदधारकों पर बहुत अधिक जिम्मेदारी डालता है और उन्हें समाज के प्रति जवाबदेह बनाता है । नीतिपरायणता की शक्ति और सत्यता को बनाए रखने की क्षमता भीतर से आनी चाहिए । ईमानदारी केवल एक सरकारी आदेश से निकलने वाला जनादेश नहीं हो सकता । सत्यनिष्ठा के लिए सार्वजनिक पदाधिकारियों को अपने कर्तव्यों का जिम्मेदारी से निर्वहन
करते हुए उचित परिश्रम करने , जनहित को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेने और अपने काम को करने तथा सरकारी संसाधनों को संभालने में ईमानदार होने की आवश्यकता है । हितों के टकराव से हर हाल में और हर समय बचना चाहिए । तदनुसार , किसी भी परिस्थिति में , आधिकारिक पद का उपयोग निजी उद्देश्यों के लिए नहीं किया जाना चाहिए । सरकारी अधिकारियों को हितधारकों के साथ अपने संबंधों के बारे में सावधान रहना चाहिए जो समाज की सर्वांगीण बेहतरी के लिए निष्पक्ष रूप से कार्य करने की उनकी क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं और उन्हें जोखिम में डाल सकते हैं । निर्णय कभी भी समाज के कुछ चुनिंदा या विशिष्ट वर्गों के लाभ से प्रेरित नहीं होने चाहिए । भारत सरकार ने एक आचार संहिता निर्धारित की है , जो केंद्र सरकार और राज्य सरकार दोनों के मंत्रियों पर लागू होती है । इसमें अन्य बातों के साथ - साथ , मंत्रियों द्वारा उनकी संपत्ति और देनदारियों का खुलासा करने , सरकार में शामिल होने से पहले जिस व्यवसाय में थे उससे सभी संबंध विच्छेद करने और स्वयं या परिवार के किसी सदस्य आदि के लिए कोई योगदान या उपहार स्वीकार नहीं करने की बात कही गई है । सिविल सेवकों के लिए आचार संहिता समय के साथ विकसित हुई है । 1930 के दशक में सिविल सेवकों के लिए क्या करें और क्या न करें वाले निर्देशों का एक संग्रह जारी किया गया था और इसे आचरण नियमावली कहा गया था । संथानम समिति की सिफारिशों के अनुसरण में , आचरण नियमावली को संशोधित और विस्तारित किया गया जिसके परिणामस्वरूप आज सीसीएस आचरण नियम 1964 का पालन किया जा रहा है । ये नियम सरकारी कर्मचारियों के लिए निर्देशों की संचालक शक्ति हैं । कानूनी ढांचे में नए आयामों की शुरूआत के आधार पर , 1964 के संस्करण के बाद से आचरण नियमों में संशोधन किया गया है । कुछ उल्लेखनीय समावेशन में शिष्टाचार का पालन करने , दहेज मांगने तथा स्वीकार करने पर रोक लगाने , महिला कर्मचारियों के यौन उत्पीड़न पर रोक लगाने ( विशाखा मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मद्देनजर ) और हाल में , 14 साल से कम उम्र के बच्चों को घरेलू नौकर के रूप में नियुक्त करने पर रोक लगाने की आवश्यकता शामिल हैं ( बाल श्रम निषेध अधिनियम में संशोधन के मद्देनजर ) । यह सतत प्रक्रिया सरकारी कर्मियों से समाज की बदलती अपेक्षाओं का प्रतिबिंब है । आचरण नियम , सामान्य व्यवहार के कुछ मानदंडों को निर्धारित करते हैं जैसे ईमानदारी तथा कर्तव्य के प्रति पूर्ण समर्पण बनाए रखना और एक सरकारी कर्मचारी का अशोभनीय आचरण में शामिल नहीं होना । यह उल्लेख करने की आवश्यकता है कि भारत में सिविल सेवकों के लिए कोई आचार - नीति निर्धारित नहीं है , जबकि ऐसी संहिता अन्य देशों में मौजूद हैं । हालांकि , हमें इस बात की सराहना करने की आवश्यकता है कि हमारी सिविल सेवा प्रणाली में संतुलित दृष्टिकोण की परंपरा है । सिविल सेवकों के लिए निर्धारित आचार संहिता काफी व्यापक है और एक निवारक के रूप में कार्य करती है , लेकिन फिर भी अपेक्षित व्यवहार के मानदंडों से विचलन के मामले सामने आए हैं । यह भी उल्लेख किया जा सकता है कि विचलन विभिन्न तंत्रों के माध्यम से देखे जाते हैं और सीसीएस ( सीसीए ) नियमों में बड़े और मामूली दंड का प्रावधान है । हालांकि , सिविल सेवकों की
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सत्यनिष्ठा के लिए सार्वजनिक पदाधिकारियों को अपने कर्तव्यों का जिम्मेदारी से निर्वहन करते हुए उचित परिश्रम करने , जनहित को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेने और अपने काम को करने तथा सरकारी संसाधनों को संभालने में ईमानदार होने की आवश्यकता है । हितों के टकराव से हर हाल में और हर समय बचना चाहिए ।
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जवाबदेही और सत्यनिष्ठा सुनिश्चित करने के लिए तंत्र प्रदान किया गया है , लेकिन तर्क दिया जाता है कि दंड देने की पूरी प्रक्रिया बहुत उबाऊ और समय लेने वाली है । ऐसे प्रक्रियात्मक मुद्दों को प्रक्रिया के प्रत्येक चरण के लिए समय - सीमा निर्धारित करके और अधिक महत्वपूर्ण रूप से निगरानी करके निपटाया जा सकता है ।
खंड -2
अंतरराष्ट्रीय अनुभव : संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2003 में भ्रष्टाचार के खिलाफ संकल्प को मंजूरी दी । संकल्प के अनुच्छेद 8 में सार्वजनिक अधिकारियों के लिए आचार संहिता का उल्लेख है । ब्रिटेन में सार्वजनिक जीवन में मानकों पर समिति , जिसे नोलान समिति के नाम से जाना जाता है , ने सार्वजनिक जीवन के सात सिद्धांतों को रेखांकित किया । स्पेन में सुशासन की संहिता की परिकल्पना है जिसके तहत सरकार के सदस्य और सामान्य राज्य प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी निर्धारित सिद्धांतों का पालन करते हुए संविधान और बाकी कानूनी प्रणाली के अनुसार अपनी गतिविधियों को अंजाम देंगे । इन्हें नीचे संक्षेप में प्रस्तुत किया गया है : समय - समय पर संशोधित सीसीएस आचार संहिता ( 1964 ) को ध्यान से पढ़ने से स्पष्ट रूप से पता चलता है कि संयुक्त राष्ट्र की घोषणा या ब्रिटेन में सार्वजनिक जीवन में मानकों पर समिति या स्पेन में सुशासन की संहिता में उल्लिखित अधिकांश सिद्धांत प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उसमें निहित है । हालांकि , इस बात पर भी जोर देने की आवश्यकता है कि सही आचरण के मानदंडों को केवल कानूनों और नियमों के कठोर प्रवर्तन के माध्यम से लागू नहीं किया जा सकता है और दृष्टिकोण में परिवर्तन बहुत महत्वपूर्ण है ।
खंड -3
संस्थागत एवं विधायी ढांचा : शासन की कुशल और प्रभावी प्रणाली के लिए शासन में ईमानदारी नितांत आवश्यक है । नैतिकता और सत्यनिष्ठा को अलग - अलग करके नहीं देखा जा सकता । दोनों आपस में जुड़े हुए हैं और इन्हें एक दूसरे के पूरक के रूप में देखा जाना चाहिए । संविधान के कामकाज की समीक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग द्वारा 2001 में प्रशासन में ईमानदारी पर जारी परामर्श पत्र में कई विधायी और संस्थागत मुद्दों पर प्रकाश डाला गया , जिनमें शामिल हैं :
1. बेनामी लेनदेन ( निषेध ) अधिनियम की धारा 5 को लागू करने की आवश्यकता ,
2. लोक सेवकों की अवैध रूप से अर्जित संपत्तियों की जब्ती का प्रावधान करने वाले कानून की आवश्यकता , 3. जनहित प्रकटीकरण कानून का अधिनियमन ,
4. सूचना की स्वतंत्रता कानून का अधिनियमन ,
5. केंद्रीय सतर्कता आयोग कानून के अलावा लोकपाल विधेयक को अधिनियमित करने की आवश्यकता और 6. आपराधिक न्यायिक प्रणाली को मजबूत करना । सुशासन विश्वास और भरोसे पर टिका होता है । शासन में ईमानदारी से सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही , पारदर्शिता और सत्यनिष्ठा सुनिश्चित किया जाना अपेक्षित है । भारत में , हमारे पास ईमानदारी से संबंधित मुद्दों के समाधान के लिए एक व्यापक विधायी और संस्थागत ढांचा है , जिसका विवरण नीचे दिया गया है :
उपरोक्त ढांचा काफी व्यापक है , फिर भी अन्य देशों की तरह हमारे पास सरकारी अधिकारियों के लिए आचारनीति संहिता और व्हिसल ब्लोअर संरक्षण अधिनियम आदि जैसे कानूनों नहीं है । एक समाज के रूप में हम निश्चित रूप से भ्रष्टाचार मुक्त बनने की आकांक्षा रखेंगे । मौजूदा मजबूत ढांचे के बावजूद , व्यवस्था में कुछ ऐसे लोग हैं जो अपने फायदे के लिए अधिकारों का दुरुपयोग करते हैं । मौजूदा तंत्र के अलावा विभिन्न कार्यों में इस प्रकार जवाबदेही और पारदर्शिता को बढ़ाया जा सकता है :
1. कार्य स्वतंत्रता को कम से कम कर ,
2. शासन के सभी क्षेत्रों में सूचना प्रौद्योगिकी का अधिक प्रयोग कर ,
3. सेवाओं और संबंधित गतिविधियों के प्रतिपादन के लिए स्पष्ट समय सीमा के साथ - साथ उन्हें प्रदान करने की जिम्मेदार निश्चित करने के साथ नागरिक चार्टर को अधिक विस्तृत बनाकर , इनके अलावा नागरिक चार्टर के अनुपालन पर एक मासिक रिपोर्ट संगठन की वेबसाइट पर डाली जा सकती है । हमारे पास प्रत्येक श्रेणी में सफलता की कहानियां हैं । कुछ प्रवेश - श्रेणी के पदों पर साक्षात्कार को समाप्त करने के सरकार के हालिया निर्देशों ने चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता को बढ़ावा दिया है । रेलवे द्वारा यात्री टिकटों की बुकिंग के लिए और नगर निकायों द्वारा जन्म तथा मृत्यु प्रमाण - पत्र जारी करने और संपत्ति कर के भुगतान के लिए सूचना प्रौद्योगिकी के उपयोग के उदाहरण सर्वविदित हैं ।
निष्कर्ष
सरकारी अधिकारी और कर्मचारी समाज का हिस्सा हैं और किसी हद तक वे भी सामाजिक मानदंडों से प्रभावित होते हैं । साथ ही , शासन संरचना का हिस्सा होने के नाते . उन्हें अधिक जिम्मेदार होना चाहिए और हर समय निष्कपट दिखना चाहिए । सत्यनिष्ठा सुनिश्चित करने के लिए एक मजबूत कानूनी और संस्थागत तंत्र विद्यमान है । लोगों को देश के कानूनों का पालन करने के लिए प्रेरित करके और साथ ही अपराधियों को बहुत कठोर दंड देकर इसे अधिक मजबूत और प्रभावी बनाने की आवश्यकता है ।
" हम अपने बच्चों से ईमानदारी से कह सकें कि ईमानदारी सबसे अच्छी नीति है , इससे पहले हमें दुनिया को ईमानदार बनाना चाहिए " जॉर्ज बर्नार्ड शॉ
संदर्भ
1 . दूसरा प्रशासनिक सुधार आयोग , चौथी रिपोर्ट- शासन में नैतिकता ,
2 . संविधान के कामकाज की समीक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग द्वारा शासन में सत्यनिष्ठा पर परामर्श पत्र
3 . सीसीएस सीसीए नियम
4. सीसीएस आचरण नियम 1964
5. http://www.oecd.org/dataoecd/17/35
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