कृषि पर्यटन में संभावनाएं |

कृषि पर्यटन को कृषि और पर्यटन का संगम माना जाता है । दूसरे शब्दों में कहें , तो कृषि पर्यटन को खेतीबाड़ी वाले क्षेत्र और कमाई वाली पर्यटन इकाई का ऐसा संयोजन माना जा सकता है जो मोटे तौर पर ग्रामीण उद्यम का हिस्सा है । कृषि में विविधता और मुनाफे में बढ़ोत्तरी की वजह से कृषि पर्यटन को फिलहाल काफी लोकप्रियता मिल रही है । शहरों से आने वाले लोग ग्रामीण इलाकों में घूमना पसंद करते हैं , ताकि वे शांतिपूर्ण ग्रामीण माहौल का अनुभव ले सकें । निसंदेह गांवों और किसानों का कायाकल्प कर सकता है कृषि पर्यटन ।
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पिछले कुछ दशकों से विकासशील देशों में कृषि पर्यटन को बढ़ावा दिया जा रहा है , ताकि ग्रामीण क्षेत्र के विकास में मदद मिल सके । आर्थिक , पर्यावरण संबंधी , जनाकिक और सामाजिक बदलाव में कृषि पर्यटन की भूमिका को काफी अहम माना जा रहा है । कृषि पर्यटन को उन इलाकों में बढ़ावा दिया जा रहा है , जहां जैव - विविधता के साथ - साथ अलग - अलग तरह की ज़मीन की उपलब्धता है । कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार है और यह गहरे रूप से भारतीय संस्कृति से जुड़ी है । कृषि पर्यटन की अवधारणा नई नहीं है । हालांकि , पिछले कुछ वर्षों में इसका महत्व बढ़ा है और इसके प्रचलन में बढ़ोत्तरी देखने को मिल रही है । कृषि पर्यटन के जरिए शहरी पर्यटकों को ग्रामीण जीवन का अनुभव मुहैया कराया जाता है । साथ ही , इन पर्यटकों को कृषि और इससे जुड़ी गतिविधियों से रूबरू होने का मौका मिलता है । कृषि पर्यटन में कृषि - आधारित गतिविधियों और पर्यटन , दोनों पहलुओं का ध्यान रखा जाता है और पर्यटक खेतों पर पहुंचते हैं । यहां पहुंचकर वे न सिर्फ छुट्टियों का आनंद उठाते हैं , बल्कि किसानों द्वारा की जाने वाली गतिविधियों को भी जानते - समझते हैं । साथ ही , किसानों को अपनी आय बढ़ाने के साथ - साथ कृषि उत्पादों और सेवाओं की मांग भी बढ़ाने के अवसर मिलता है । किसानों द्वारा अलग - अलग तरह की फसल की खेती पर जोर और उनके लाभ में बढ़ोत्तरी जैसी वजहों से कृषि पर्यटन की लोकप्रियता को बढ़ावा मिल रहा है । एक वजह य भी है कि शहरों के लोग गांवों के शांतिपूर्ण माहौल में कुछ सम बिताना चाहते हैं । हाल में पर्यटकों द्वारा खेतों में घूमने , खेतों के आसपास ठहर गांवों में रहने आदि का प्रचलन बढ़ा है । यह प्रचलन पर्यटन स्थल पर कुछ प्रमुख स्थानों को देखने की पारंपरिक पर्यटन गतिवि से बिल्कुल अलग है । कृषि को पर्यटन क्षेत्र से जोड़ने पर ग्रामी " अर्थव्यवस्था को काफी बढ़ावा मिलता है और इस तरह कृ पर्यटन की मज़बूत बुनियाद तैयार होती है । ' कृषि पर्यटन ' को क अलग - अलग नामों से भी जाना जाता है , जैसेकि खेती से जुड पर्यटन , एग्रीटेनमेंट ( कृषि और मनोरंजन ) आदि । कृषि पर्यटन क बढ़ावा देने के लिए , इसे ग्रामीण पर्यटन , पर्यावरण - अनुकूल पर्यट ( इको टूरिज्म ) , स्वास्थ्य पर्यटन और साहसिक पर्यटन ( एडवेंच टूरिज्म ) के साथ जोड़ने की ज़रूरत है । भारत में कृषि पर्यटन तीन मुख्य स्तंभ हैं - कृषि और संबंधित गतिवधियों से मनोरंजन , खेद

के आसपास ठहराव और स्थानीय कृषि उत्पाद की मार्केटिंग । देश में कृषि से जुड़े पारिस्थितिकी तंत्र की विविधता , प्राकृतिक संसाधनों और आधारभूत संरचना आदि को देखते हुए कृषि पर्यटन को कृषि अर्थव्यवस्था बढ़ाने के संभावित विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है । 


अवधारणा 

कृषि पर्यटन को कृषि और पर्यटन का संगम माना जाता है । दूसरे शब्दों में कहें , तो कृषि पर्यटन को खेतीबाड़ी वाले क्षेत्र और कमाई वाली पर्यटन इकाई का ऐसा संयोजन माना जा सकता है जो मोटे तौर पर ग्रामीण - उद्यम का हिस्सा है । कृषि पर्यटन का मुख्य मकसद यह होता है कि पर्यटक कुछ देखें , कुछ अपने मन का करें और कुछ खरीदारी भी करें । खेतों में कई तरह की गतिविधियां होती हैं , जैसे कि उत्पादन और इसके बाद की गतिविधियां , प्रसंस्करण से जुड़ी गतिविधियां । इन्हें पर्यटन क्षेत्र से भी जोड़ा जाता है और इस तरह पर्यटक भी इन गतिविधियों से आकर्षित होकर इन जगहों पर पहुंचते हैं । इन गतिविधियों और उद्यमों का दोहरा मकसद होता है- पहला , पर्यटकों का मनोरंजन करने के साथ - साथ उन्हें खेती के स्थानीय तौर - तरीकों के बारे में जानकारी देना और दूसरा , पर्यटकों के मेजबान किसान के लिए आय का स्रोत पैदा करना । पर्यटन के कुछ खास पहलुओं को कृषि उद्यमिता के साथ जोड़ने से पर्यटकों को इन उद्यमों या खेतों में मौजूद फसलों की तरफ आकर्षित करने में मदद मिलती है । इसका मुख्य मकसद किसानों की आय बढ़ाना और पर्यटकों को आनंद , मनोरंजन , बेहतर अनुभव और जानकारी उपलब्ध कराना होता है । कृषि पर्यटन संबंधी गतिविधियां , समय और जगह के हिसाब से अलग - अलग हो सकती हैं । अगर छोटे स्तर पर ऐसी गतिविधियां चलाई जा रही हैं , तो इसमें ग्राहकों की संख्या सीमित होगी और किसी खास सीजन में इसका संचालन किया जाएगा । हालांकि , बड़े पैमाने पर चलाई जाने वाली ऐसी गतिविधियां पूरे साल चालू रहती हैं और पर्यटकों को सेवाएं मुहैया कराई जाती हैं । शहरी लोग खेतों में घूमते हैं , फार्म हाउस में ठहरते हैं , खेती संबंधी गतिविधियों में शामिल होते हैं , अलग - अलग तरह की सवारी का आनंद उठाते हैं ( जैसे जानवरों की सवारी , बैलगाड़ी - ट्रैक्टर की सवारी आदि ) , स्थानीय भोजन का स्वाद लेते हैं , खेतों की ताज़ा सब्जियां और फल खरीदते हैं और स्थानीय कला व संस्कृति को समझते हैं । किसानों द्वारा पर्यटकों को कई तरह की सेवाओं की पेशकश की जाती है । हालांकि , ये सेवाएं एक - दूसरे से अलग होती हैं । ऐसे उत्पाद और सेवाओं में ठहरने का इंतजाम , मनोरंजन , कृषि उत्पादों की खुदरा विक्री . कृषि संबंधी गतिविधियों में सहभागिता का अवसर प्रदान करना आदि शामिल हैं । कृषि पर्यटन को अलग - अलग तरह के खेतों , कृषि संबंधी मौजूदा सुविधाओं और अनुभव व अन्य गतिविधियों के आधार पर श्रेणियों में बांटा जा सकता है । कृषि पर्यटन के तहत पर्यटकों को अलग - अलग स्तर पर सुविधाएं मुहैया कराई जा सकती हैं । अगर पर्यटकों को सिर्फ ठहरने , खाने और मनोरंजन संबंधी गतिविधियों की सुविधा दी जाती है , तो इसे अप्रत्यक्ष कृषि पर्यटन कहा जाता है । इसके अलावा , अप्रत्यक्ष कृषि पर्यटन में खेती संबंधी गतिविधियों का नमूना पेश किया जाता है और कृषि से जुड़ी बुनियादी जानकारी भी दी जाती है । प्रत्यक्ष कृषि पर्यटन में ऊपर बताई गई गतिविधियों के अलावा बुआई , पौधे लगाने , बागवानी , फसलों की कटाई , गायों से दूध निकालने आदि काम में पर्यटकों की भागीदारी भी सुनिश्चित की जाती है । 


अहमियत 

अगर हम पर्यटन क्षेत्र के लिहाज से देखें , तो कहा जा सकता है कि भारत समेत पूरी दुनिया में कृषि पर्यटन में जबर्दस्त संभावनाएं हैं । भारत के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का अहम योगदान है । कृषि को भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी कहा जाता है । कृषि पर्यटन की मदद से देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि की हिस्सेदारी बढ़ सकेगी और कृषि व पर्यटन उद्योग के लिए अतिरिक्त आमदनी की गुंजाइश बनेगी । देश के कुल करीब साढ़े छह लाख गांवों के 9 करोड़ किसान ( इनमें 80 प्रतिशत छोटे और सीमांत किसान हैं ) पूरे देश को अन्न उपलब्ध कराते हैं , लिहाजा उनके लिए आय के अलग - अलग स्रोत पैदा कर उनकी आमदनी बढ़ाना बेहद जरूरी है । कृषि पर्यटन के जरिए किसान परिवारों के लिए रोजगार के अवसर पैदा कर आय का अतिरिक्त स्रोत हासिल किया जा सकता है । इस तरह , कृषि पर्यटन खेती या कृषि उद्यमिता / कृषि कारोबार की अनिश्चितता को भी कम करने में सहायक है । कई क्षेत्रों में किसानों ने इसकी अहमियत को समझते हुए अपनी खेती या कृषि कारोबार को कृषि पर्यटन के साथ जोड़ने की कोशिश की है , ताकि पर्यटकों का ध्यान आकर्षित करने के साथ - साथ उनकी जरूरतों को भी पूरा किया जा सके । कृषि पर्यटन के जरिए पर्यटकों , किसानों और गांव के लोगों को कई तरह के वित्तीय , शैक्षणिक और सामाजिक फायदे उपलब्ध कराए जाते हैं । कृषि पर्यटन के तहत कृषि और पर्यटन , दोनों क्षेत्रों को मिलकर काम करने का मौका मिलता है जिससे दोनों के लिए बेहतर वित्तीय अवसर उपलब्ध होते हैं । इससे किसानों को अपने कृषि उत्पादों का प्रचार करने और उन्हें सीधे तौर पर ग्राहकों को बेचने में मदद मिलती है । किसान कृषि पर्यटन को अपनी अतिरिक्त आय के विकल्प के तौर पर चुनते हैं । पर्यटकों को इससे जुड़ी विभिन्न सेवाएं उपलब्ध कराने में पूरे कृषक परिवार की सहभागिता होती है । पर्यटक अपने ठहराव के दौरान खेती से जुड़ी गतिविधियों में शामिल होते हैं , प्रकृति व स्थानीय स्वाद का आनंद उठाते हैं , मेलों में धूमते हैं और कृषि व स्थानीय हस्तकला से जुड़े उत्पाद भी खरीदते हैं । इस तरह , इन गतिविधियों से पर्यटन उद्योग को बढ़ावा मिलता है और रोजगार के नए अवसर उपलब्ध होते हैं । कृषि पर्यटन खेती योग्य जमीन के संरक्षण और खेती संबंधी उद्यमों को बढ़ावा देने के लिए शिक्षण के अवसर भी उपलब्ध कराता है । कृषि पर्यटन गांवों से शहरी इलाकों में होने वाले पलायन को रोकने और खेती में युवाओं की भागीदारी बनाए रखने में भी कारगर
है । अतः यह कहा जा सकता है कि कृषि पर्यटन पर्यावरण को लेकर जागरूक होने के साथ - साथ सामाजिक रूप से जिम्मेदार , सांस्कृतिक रूप से उपयुक्त , नैतिक रूप से बेहतर और आर्थिक रूप से लाभदायक है ।


 

भारत में कृषि पर्यटन

 साल 2011 की जनगणना के मुताबिक , देश की कुल 69 प्रतिशत आबादी गावों में रहती है और 62 प्रतिशत आबादी अपनी आजीविका के लिए खेती पर निर्भर है । पर्यटन क्षेत्र ने भारत में 3.7 करोड़ रोजगार उपलब्ध कराए हैं और 2015 में देश के कुल रोजगार में पर्यटन क्षेत्र की हिस्सेदारी तकरीबन 9 प्रतिशत थी । पर्यटन क्षेत्र का तेजी से विस्तार हो रहा है और कृषि क्षेत्र की मदद से कृषि पर्यटन को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया जा सकता है । किसी क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता , जलस्रोत और पारंपरिक हस्तकलाओं से ग्रामीण इलाकों में पर्यटन को बढ़ावा मिलता है । ग्रामीण पर्यटन की शुरुआत दसवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान की गई थी । इसके तहत 103 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई थी । इसके बाद , 11 वीं पंचवर्षीय योजना में ग्रामीण पर्यटन से जुड़ी 69 और परियोनाओं की अनुमति दी गई , जबकि 12 वीं पंचवर्षीय योजना में इस मकसद के लिए 770 करोड़ रुपये आवंटित किए गए । राजस्थान और केरल ने सबसे पहले इस पहल का फायदा उठाया । हालांकि , बाद में अलग - अलग जिलों में कृषि पर्यटन को लागू करने में महाराष्ट्र सबसे आगे रहा । साल 2004 में कृषि पर्यटन विकास निगम ( एटीडीसी ) की स्थापना की गई । निगम ने शुरू में कृषि पर्यटन को पुणे की बारामती तहसील के पलशिनवाड़ी गांव में कृषि पर्यटन को पायलट परियोजना के तौर पर लागू किया गया । निगम ने 2005 में 28 एकड़ जमीन में इसे शुरू किया था । कृषि पर्यटन से जुड़ी गतिविधियों में कृषि पर्यटन केंद्रों का संचालन , किसानों को ऐसी गतिविधियों के लिए प्रोत्साहित करना और प्रशिक्षण व शोध कार्यक्रमों का आयोजन शामिल है । ज्यादातर पर्यटक इन केंद्रों के जरिए बुकिंग कर इन जगहों पर घूमने आते हैं , लिहाजा इससे मार्केटिंग पर किसानों का खर्च बचता है । कृषि पर्यटन विकास निगम ने महाराष्ट्र राज्य कृषि पर्यटन विस्तार योजना के तहत 2007 में प्रशिक्षण और कौशल विकास कार्यक्रमों की शुरुआत की थी । इस पहल का मकसद गांवों के पर्यावरण , परंपराओं , संस्कृति , कला और हस्तकलाओं का संरक्षण करना था । शुरुआत में इस अभियान में 52 किसानों को शामिल किया गया था । महाराष्ट्र के 30 जिलों के 328 कृषि पर्यटन केंद्रों में कृषि पर्यटन के इस मॉडल को दोहराया गया । एटीडीसी के सर्वेक्षण के मुताबिक , 2014 , 2015 और 2016 के दौरान इन केंद्रों में क्रमश : 4 लाख , 5.3 लाख और 7 लाख पर्यटक पहुंचे और इससे किसानों , ग्रामीण महिलाओं और ग्रामीण युवाओं को कुल 357 करोड़ रुपये की आय हुई । अतः कृषि पर्यटन किसानों , पर्यटकों और सरकार सभी के लिए फायदेमंद है । कृषि पर्यटन के विकास के लिए जैव - विविधता और अलग - अलग तरह की जमीन की मौजूदगी आदर्श स्थिति है ।
महाराष्ट्र पर्यटन नीति 2016 में कृषि पर्यटन पर विशेष जोर दिया गया और इसमें छोटे किसानों के लिए कृषि पर्यटन की संभावना सुनिश्चित करने पर ध्यान देने की बात कही गई । साथ ही , पांचवीं से दसवीं कक्षा के छात्र - छात्राओं के लिए कृषि पर्यटक केंद्रों का शैक्षणिक दौरा ज़रूरी करने , ' महाभ्रमण योजना के तहत कृषि पर्यटन का प्रचार - प्रसार करने और ऐसे केंद्रों की स्थापना के लिए छोटे किसानों को वित्तीय मदद मुहैया कराने जैसी बातें भी इस नीति में शामिल थीं । महाराष्ट्र के अलग - अलग जिलों में कृषि पर्यटन की सफलता के कई उदाहरण मौजूद हैं ( www.agritourism.in ) | i देश के अन्य हिस्सों में भी इस तरह की पहल की गई है । गेहूं के खेतों और पहाड़ों के खूबसूरत नजारों के बीच होमस्टे ( ठहरने की जगह ) की सुविधा और उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में अलग - अलग गतिविधियों में पर्यटकों को शामिल करने जैसी पहल को भी कृषि पर्यटन मॉडल के तौर पर पेश किया जा रहा है । देश के पूर्वी हिस्से में लगने वाले पशु मेलों में देश ही नहीं विदेशी पर्यटकों ने भी अपनी दिलचस्पी दिखाई है । मोंताना ( Montana ) होमस्टे और सिक्किम में सालाना होने वाला फूलों का उत्सव , केरल और तमिलनाडु में मसालों के बाग की सैर जैसी गतिविधियां भी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र हैं । आंध्र प्रदेश पर्यटन विकास निगम ( एपीटीडीसी ) के गेस्ट हाउस में फल - सब्जियों की खेती , डेयरी , मछली पालन , पॉली हाउस और खेतों के बीच ठहरने जैसी सुविधाओं के जरिए कृषि पर्यटन को बढ़ावा दिया जा रहा है , ताकि पर्यटक प्रकृति के साथ - साथ ग्रामीण जीवन का आनंद उठा सकें । कृषि पर्यटन से जुड़ी सफलता की ज्यादातर कहानियों से पता चलता है कि कृषि संबंधी गतिविधियों के साथ - साथ पर्यटन आधारित सेवाएं मुहैया कराने से किसानों का जीवन और पर्यटन के मायने , दोनों पूरी तरह से बदल सकते हैं । भारत में कृषि पर्यटन मुख्य तौर पर फिलहाल देश के पश्चिमी राज्य महाराष्ट्र तक सीमित है । हालांकि , धीरे - धीरे यह केरल , कर्नाटक , पंजाब , राजस्थान और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में भी अपनी जगह बना रहा है । इस तरह , बड़े पैमाने पर कृषि पर निर्भर राज्यों के लिए यह एक नए उद्योग की तरह है । 




आय बढ़ाने का साधन 

कृषि पर्यटन किसानों के लिए आय बढ़ाने का एक संभावित विकल्प है । पर्यटकों की दिलचस्पी पैदा करने के लिए किसानों को कृषि संबंधी गतिविधियों का विस्तार करने की जरूरत होती है । फसलों की कटाई के तुरंत बाद ताजा उत्पाद के तौर पर इसकी बिक्री का इंतजाम करना , पर्यटकों के सामने उत्पाद को तैयार करना , उसे बेहतर बनाना और खेतों पर ही उत्पाद की मार्केटिंग आदि के जरिए न सिर्फ पर्यटकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है , बल्कि इससे उन्हें तुरंत आय भी मिल पाती है । किसी कृषि उत्पाद की सीधी बिक्री उस खास क्षेत्र में नए उपभोक्ता आधार तैयार करती है । पर्यटकों की दिलचस्पी से जुड़ी गतिविधियों पर फोकस , फसलों को तैयार करने में सहभागिता , फूड पार्क , कृषि संग्रहालय जैसी

पहल से भी आय का अतिरिक्त स्रोत हासिल किया जा सकता है । संसाधनों के तौर पर कृषि उत्पादों का इस्तेमाल करके कृषि उद्यमिता को बढ़ावा दिया जा सकता है , जिससे कृषि कारोबार और रोज़गार के अवसर पैदा होंगे । अतः कृषि पर्यटन अलग - अलग माध्यम और गतिविधियों के जरिए अतिरिक्त आय पैदा करने में सहायक हो सकता है , मसलन ( i ) किसानों का बाजार जहां पर्यटक कृषि उत्पाद खरीद सकते हैं , 
( ii ) खुद से उत्पादों को चुनना , जिसके तहत पर्यटक खुद से फसलों को तैयार कर सकते हैं , ( iii ) स्थानीय भोजन , जिसके तहत पर्यटक नाश्ते और खाने में स्थानीय स्वाद वाले आइटम पसंद करते हैं , ( iv ) कृषि और मनोरंजन से जुड़ी अलग - अलग गतिविधियों
 ( जैसे कि पशुओं की सवारी , पक्षियों को देखना आदि ) में पर्यटकों की भागीदारी सुनिश्चित करना और स्थानीय यात्राओं के ज़रिए ग्रामीण जीवन का अनुभव हासिल करना । कृषि पर्यटन न सिर्फ सीधे तौर पर किसानों के लिए आय और रोजगार के अवसर प्रदान करता है , बल्कि इससे गांवों में रहने वाले बाकी लोगों को भी अप्रत्यक्ष रूप से मदद मिलती है । खेतों का दौरा करने वाले पर्यटकों को अन्य सुविधाओं और उत्पादों की भी जरूरत होती है , जो अन्य स्थानीय लोगों की कारोबारी गतिविधियों के जरिए उपलब्ध होते हैं । इस तरह , स्थानीय कारोबारी गतिविधियों से आय और रोजगार को बढ़ावा मिलता है । कृषि पर्यटन स्थानीय परंपराओं , कला और संस्कृति के संरक्षण में भी सहायक है । कृषि संबंधी गतिविधियों में दिलचस्पी रखने वाले पर्यटक स्थानीय हस्तकलाओं से जुड़े सामान और स्मारिका भी खरीदते हैं । कृषि पर्यटन सामुदायिक सुविधाओं को भी बेहतर बनाने का मार्ग प्रशस्त करता है । इससे ग्रामीण महिलाओं के सशक्तीकरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाने में भी मदद मिलती है । 




कृषि पर्यटन के लाभ 

कृषि पर्यटन अलग - अलग तरीके से सभी संबंधित पक्षों को लाभ पहुंचाता है । कृषि पर्यटन से जुड़े पक्षों में किसान सबसे प्रमुख हैं । कृषि पर्यटन के ज़रिए कृषि उत्पादों का नए ढंग से इस्तेमाल कर कृषि संबंधी गतिविधियों का विस्तार किया जा सकता है । इससे एक खास तरह का नया उपभोक्ता बाज़ार बनाने में मदद मिलती है , जहां लोग स्थानीय कृषि उत्पादों के बारे में जागरूक हों । इस तरह , किसानों की आय में बढ़ोत्तरी होगी और खेती योग्य जमीन की बेहतर ढंग से देखरेख करने में मदद मिलेगी और परिवार के बाकी सदस्यों को भी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तरीके से अलग - अलग गतिविधियों में शामिल किया जा सकेगा । साथ ही , किसानों के लिए आजीविका का ठोस आधार तैयार हो सकेगा , उनमें उद्यम और प्रबंधकीय कौशल विकसित होगा , कृषि उद्यमिता को बढ़ावा मिलेगा और कृषि और इससे जुड़े कारोबार को टिकाऊ बनाया जा सकेगा । कृषि पर्यटन कई मायनों में छोटे किसानों के लिए भी फायदेमंद है । इसके लिए ज्यादा जमीन की ज़रूरत नहीं होती । महाराष्ट्र में ज्यादातर कृषि पर्यटन केंद्र 1-10 एकड़ के क्षेत्रफल में मौजूद हैं । ज्यादातर कृषि पर्यटन केंद्र 30 से 60 साल के ऐसे किसान चला रहे हैं जिन्होंने उच्च शिक्षा भी हासिल की है । आजीविका के लिए गांवों से शहरों में पलायन एक प्रमुख मुद्दा है । कृषि पर्यटन को बढ़ावा देकर इस चुनौती से निपटा जा सकता है । कृषि पर्यटन स्थानीय समुदाय के लोगों के लिए भी विकास का जरिया है । यह स्थानीय कारोबार और सेवाओं के लिए अतिरिक्त आमदनी का स्रोत भी है । दरअसल , पर्यटकों की मौजूदगी से स्थानीय - स्तर पर विभिन्न सेवाओं और सुविधाओं की भी मांग बढ़ती है । यह स्थानीय कला , हस्तकला और संस्कृति को भी मजबूती प्रदान करता है और अंतर - क्षेत्रीय व अंतर - सांस्कृतिक संवाद और सहमति को बढ़ावा देता है । कृषि पर्यटन से कृषि संबंधी गतिविधियों , इससे जुड़े अन्य विषयों और मूल्यों के बारे में लोगों को जागरूक करने में मदद मिलती है और स्थानीय कृषि उत्पाद और सेवाओं के इस्तेमाल में बढ़ोत्तरी के साथ - साथ ग्रामीण इलाकों में आय और रोज़गार के अवसर भी उपलब्ध होते हैं जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होती है । साथ ही , छोटे उद्यमों के ज़रिए ग्रामीण उद्यमिता के लिए अनुकूल माहौल भी मिलता है । अगर हम पर्यटकों के नज़रिए से बात करें , तो यात्रा , ठहरने , भोजन और मनोरंजन के मामले में कृषि पर्यटन सबसे कम खर्चीला है । शहरों में रहने वाले लोग प्रदूषण मुक्त , कम भीड - भाड़ वाला और प्राकृतिक माहौल चाहते ताकि वे तनाव भरे शहरी माहौल से खुद को कुछ समय के लिए अलग कर सकें और अपने बच्चों को कृषि व ग्रामीण इलाकों से भी रूबरू करा सकें । इस वजह से हाल के वर्षों में कृषि पर्यटन का दायरा बढ़ा है । कृषि पर्यटन कम खर्च में पूरे परिवार को मनोरंजन और विश्राम उपलब्ध कराता है । शहरों में जागरूक लोगों के बीच अब आयुर्वेद और जैविक खाद्य पदार्थों की लोकप्रियता बढ़ रही है । ऐसे लोग प्राकृतिक चिकित्सा की शरण में भी जा रहे हैं । कृषि पर्यटन में ये सारी चीजें पहले से मौजूद हैं , क्योंकि यह प्रकृति के बिल्कुल करीब है । महात्मा गांधी ने कहा था कि भारत की आत्मा गांवों में निवास करती है । जाहिर तौर पर शहरी आबादी इस बात को लेकर जागरूक है कि उनकी जड़ें ग्रामीण इलाकों में हैं । इसी वजह से शहरों के लोग गांवों और खेतों में थोड़ा - सा समय गुज़ारने की इच्छा रखते हैं और कृषि व गांवों से जुड़ी गतिविधियों का आनंद उठाते हैं । शहरी लोगों के बीच ग्रामीण जीवन के बारे में जागरूकता फैलाने और कृषि संबंधी जानकारी उपलब्ध कराने में कृषि पर्यटन की भूमिका बेहद अहम है । यह कृषि सबंधी शिक्षा और प्रशिक्षण से जुड़ा संभावित टूल भी माना जाता है । ' अतुल्य भारत ' ब्रांड को बढ़ावा देने के लिए दसवीं पंचवर्षीय योजना से ही नीतिगत मोर्चे पर अनुकूल माहौल देखने को मिल रहा है । इस दौरान पर्यटन क्षेत्र के लिए बजट आवंटन 525 करोड़ से बढ़ाकर 2,900 करोड़ रुपये कर दिया गया और ग्रामीण पर्यटन के लिए 50 लाख रुपये प्रति गांव आवंटित किए गए । पर्यटन एजेंसियां संभावित पर्यटकों के लिए अलग - अलग तरह के पर्यटन पैकेज और सेवाओं को मिलाकर कृषि पर्यटन से फायदा हासिल करती हैं

और ग्रामीण इलाकों की तरफ पर्यटकों का ध्यान आकर्षित करती हैं । साथ ही , बारी - बारी से किसी खास तरह के उत्पाद / सेवा के ' पीक सीजन का इस्तेमाल किया जाता है , ताकि पूरे साल पर्यटन कारोबार को चलाया जा सके , ग्रामीण क्षेत्रों को पर्यटन उद्योग के दायरे में शामिल किया जा सके व स्थानीय कारोबार के लिए फंड का बेहतर इंतजाम सुनिश्चित हो सके ।




 चुनौतियां 

कृषि पर्यटन के सामने कई तरह की चुनौतियां भी हैं । इनमें पर्यटकों को आकर्षित करना , उनके लिए ठहरने और मनोरंजन संबंधी गतिविधियों का इंतजाम , खाने - पीने और सुरक्षा की व्यवस्था , मेडिकल सुविधाए और दुर्घटना की स्थिति में जोखिम के अलावा अन्य चुनौतियां भी शामिल हैं । कृषि पर्यटन के विकास के लिए अलग - अलग चरणों में सतत प्रयास की ज़रूरत है , जैसे कि जमीन को जरूरत के हिसाब से तैयार करना , ठहरने और अन्य सुविधाओं का इंतजाम , उद्यम विकसित करना और कृषि पर्यटन के लिए आधारभूत संरचना का विकास । कृषि पर्यटन को बढ़ावा देने से जुड़ी प्रमुख चुनौतियों में किसानों के बीच जानकारी और प्रशिक्षण का अभाव और आधारभूत संरचना की कमी आदि शामिल हैं । हमें ऐसे संभावित किसानों और उद्यमियों की पहचान करनी होगी जो जरूरी कौशल के साथ कृषि पर्यटन परियोजनाओं को लागू कर सकें । इसके अलावा , बेहतर नियोजन और प्रबंधकीय तौर - तरीकों की जानकारी के अभाव में , किसानों और कृषि उद्यमियों के लिए कृषि पर्यटन की स्थापना और प्रबंधन का काम चुनौतीपूर्ण हो सकता है । किसानों को सलाह जारी कर खेतीबाड़ी को कृषि पर्यटन से जोड़ने के महत्व के बारे में बताया जाना चाहिए , ताकि वे पर्यटकों की ज़रूरतों के हिसाब से उत्पाद और सेवाएं उपलब्ध करा सकें । । कृषि पर्यटन को लागू करने से जुड़ी चुनौतियों में सेवाओं की गुणवत्ता और जटिलता व संबंधित पक्षों के बीच सहयोग भी शामिल हैं । कृषि पर्यटन नेटवर्क में खेती , मेडिकल सुविधाएं , परिवहन की सुविधा , सुरक्षा से जुड़े पहलू . मीडिया और संचार , पर्यटन एजेंसियां , सरकार और हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री शामिल हैं । इन तमाम सेवाओं के बेहतर प्रबंधन के ज़रिए ही कृषि पर्यटन को सफलतापूर्वक लागू किया जा सकता है । 




कृषि पर्यटन को बढ़ावा देने की रणनीतियां 

कृषि पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए सबसे पहले कृषि पर्यटन उद्योग की सही तरीके से पहचान करना ज़रूरी है । बेहतर सरकारी नीतियां , किसानों में कृषि कारोबार / उद्यमिता कौशल विकसित करने के लिए उनमें ज़रूरी क्षमता का निर्माण , कृषि पर्यटन को लागू करने के लिए किसानों की सहकारी समिति का गठन , वित्तीय सहायता , उत्पाद और सेवा की गुणवत्ता में सुधार के लिए किसानों को प्रशिक्षण , बेहतर मार्केटिंग , जोखिम प्रबंधन और जगह के हिसाब से सफल कृषि पर्यटन मॉडल तैयार कर कृषि पर्यटन की राह आसान की जा सकती है । आवश्यकता - आधारित प्रोफेशनल कार्यक्रम के जरिए कृषि पर्यटन कारोबार का प्रबंधन किया जा सकता है । 
साथ ही , कृषि से जुड़ी बुनियादी जानकारी भी उपलब्ध कराई जा सकती है । इस मकसद को ध्यान में रखते हुए डॉ . राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय , पूसा ने इसी साल से कृषि पर्यटन में परा - स्नात्तक डिप्लोमा कोर्स शुरू किया है । इस तरह के कोर्स में कृषि पर्यटन , कृषि पर्यटन कारोबार प्रबंधन , कृषि पर्यटन उत्पाद और सेवाएं , संबंधित जगह का विकास और प्रबंधन , मार्केटिंग प्रबंधन , मार्केटिंग की रणनीतियां आदि विषयों के बारे में बुनियादी जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए । अगर किसानों के नज़रिए से बात करें , तो कृषि पर्यटन को लागू करने की रणनीति में उत्पाद , कीमत , जगह और प्रचार - प्रसार जैसे पहलुओं को ध्यान में रखना चाहिए । ठहरने की उपलब्धता , परिवहन की सुविधा , किसानों की क्षमता का निर्माण ऐसे मुद्दे हैं जिन पर तत्काल ध्यान दिए जाने की ज़रूरत है । इन मुद्दों पर सार्वजनिक - निजी साझेदारी के ज़रिए काम किया जा सकता है । कृषि पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए विकास के साथ - साथ भारतीय कृषि के अनुभवों से जुड़ी थीम पर काम करने की जरूरत है । सरकार पहले भी पर्यटन के क्षेत्र में अतुल्य भारत , केरल पर्यटन , गोवा पर्यटन जैसे थीम पर काम कर चुकी है । महाराष्ट्र का कृषि पर्यटन इस क्षेत्र के बारे में जागरूकता फैलाने में सफल रहा है । कृषि पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए , बाकी राज्यों को भी इसी तरह की रणनीतियों को अपनाने की जरूरत है ।


 निष्कर्ष

 कृषि पर्यटन के तहत किसान अपनी खेती योग्य ज़मीन में पर्यटकों के लिए कई तरह की सुविधाएं और अनुभव मुहैया कराते हैं , जैसे कि ग्रामीण परिवेश में ठहरने का इंतजाम और सहभागिता व मनोरंजन के ज़रिए सीखने / शिक्षण के प्राकृतिक माहौल की सुविधा उपलब्ध कराना । देश के विभिन्न राज्यों में इस तरह का पर्यटन काफी लोकप्रिय हो रहा है । कृषि पर्यटन किसानों , कृषक परिवारों , ग्रामीण समुदायों , पर्यटकों और पर्यटन से जुड़े संचालकों के लिए काफी फायदेमंद है । कृषि पर्यटन केंद्रों को बनाए रखने और उनके बेहतर संचालन व प्रबंधन के लिए सलाह मुहैया कराना और किसानों की क्षमता का निर्माण जरूरी है । देश के विभिन्न राज्यों में मौजूद कृषि पर्यटन केंद्रों के बारे में जानकारी उपलब्ध कराना ज़रूरी है , ताकि संभावित पर्यटकों का ध्यान इस ओर आकर्षित किया जा सके । भारत में कृषि पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए इसे पर्यटन पैकेज का जरूरी हिस्सा बनाने और इस क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी विकसित करने की ज़रूरत है , ताकि भारतीय अर्थव्यवस्था ( विशेष तौर पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था ) को मज़बूत करने में इसका योगदान सुनिश्चित हो सके ।

 ( सौविक घोष कृषि संस्थान , विश्व भारती विश्वविद्यालय , श्रीनिकेतन , वीरशूम , पश्चिम बंगाल में प्रोफेसर हैं ; उषा दास गोविंद वल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय , पंतनगर , उत्तराखंड में रिसर्च / डॉक्टोरल स्कॉलर हैं । लेख में व्यक्त विचार निजी हैं । ) ई - गेल : souvik.ghosha visva-bharati.ac.in usha 24.das@gmail.com

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